बिहार में मां के दूध में मिला यूरेनियम: 70% बच्चों को खतरा, जानें पूरी सच्चाई
चौंकाने वाली रिसर्च से खुलासा : –
दोस्तों, आज मैं आपको एक ऐसी खबर के बारे में बताने जा रहा हूं जिसे सुनकर हर मां-बाप का दिल दहल जाएगा। बिहार में हाल ही में हुई एक स्टडी में पता चला है कि मां के दूध में यूरेनियम जैसी खतरनाक धातु मिली है। जब मैंने यह खबर पढ़ी तो पहले तो विश्वास ही नहीं हुआ – भला मां का दूध, जो बच्चों के लिए सबसे शुद्ध और पौष्टिक माना जाता है, उसमें यूरेनियम कैसे आ सकता है ?
लेकिन हकीकत यही है। महावीर कैंसर संस्थान पटना, लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी पंजाब, एम्स दिल्ली और ICMR जैसी बड़ी संस्थाओं ने मिलकर यह शोध किया है। नतीजे बताते हैं कि 70% शिशुओं को नॉन-कार्सिनोजेनिक यानी कैंसर रहित स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा हो सकता है।
मगर घबराइए मत, क्योंकि पूरी कहानी थोड़ी अलग है और विशेषज्ञों का कहना है कि तुरंत कोई बड़ा खतरा नहीं है। चलिए, आज हम इस पूरे मामले को सरल भाषा में समझते हैं।
क्या है पूरी स्टडी का सच ?
यह शोध बिहार के छह जिलों – भोजपुर, समस्तीपुर, बेगूसराय, खगड़िया, कटिहार और नालंदा में किया गया। वैज्ञानिकों ने 40 स्तनपान कराने वाली माताओं के दूध के सैंपल लिए। उनकी उम्र 17 से 35 साल के बीच थी। सभी माताओं से लिखित सहमति लेकर उनके दूध का परीक्षण किया गया।
जब परिणाम आए तो सभी 40 सैंपलों में यूरेनियम-238 पाया गया। यानी 100% सैंपलों में! यूरेनियम की मात्रा 0 से लेकर 5.25 माइक्रोग्राम प्रति लीटर तक थी। सबसे ज्यादा यूरेनियम कटिहार जिले के सैंपल में मिला जहां 5.25 माइक्रोग्राम प्रति लीटर था, जबकि औसत में सबसे ज्यादा खगड़िया जिले में 4.035 माइक्रोग्राम प्रति लीटर पाया गया।
यूरेनियम आया कहां से ?
अब आप सोच रहे होंगे कि भला मां के दूध में यूरेनियम कैसे पहुंचा? तो बता दूं, यूरेनियम एक प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला रेडियोएक्टिव तत्व है जो ग्रेनाइट और दूसरी चट्टानों में मौजूद होता है। यह कई तरीकों से पर्यावरण में फैलता है:
भूजल से : बिहार में भूजल प्रदूषण एक गंभीर समस्या है। पीने के पानी में यूरेनियम की मौजूदगी का मतलब है कि यह शरीर में भी पहुंच रहा है। बिहार के कुछ इलाकों में भूजल में यूरेनियम का स्तर काफी ऊंचा पाया गया है – सुपौल में 82 माइक्रोग्राम प्रति लीटर, नालंदा में 77 और वैशाली में 66 माइक्रोग्राम प्रति लीटर।
कोयला जलाने से : कोयले में भी यूरेनियम होता है और जब इसे जलाया जाता है तो यह हवा में फैल जाता है।
खेती में फॉस्फेट उर्वरकों का इस्तेमाल : फॉस्फेट वाली खादों में भी यूरेनियम की मात्रा होती है जो मिट्टी और पानी में मिल जाती है।
खनन और परमाणु उद्योग : इन गतिविधियों से भी यूरेनियम पर्यावरण में फैलता है।
70% बच्चों को खतरे का मतलब क्या ?
अब आते हैं सबसे चिंताजनक बात पर। स्टडी में पाया गया कि 70% शिशुओं का हैजर्ड कोशेंट (HQ) 1 से ज्यादा है। इसका मतलब है कि उन्हें नॉन-कार्सिनोजेनिक स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा हो सकता है।
लेकिन यहां एक बड़ी बात समझनी जरूरी है। यह आंकड़ा एक रिस्क मॉडलिंग के आधार पर निकाला गया है, न कि वास्तविक स्वास्थ्य समस्याओं के आधार पर। यानी अगर यूरेनियम की यह मात्रा लंबे समय तक शरीर में रहे तो क्या हो सकता है – यह एक अनुमान है।
यूरेनियम के संपर्क में आने से बच्चों में यह समस्याएं हो सकती हैं :
किडनी का विकास प्रभावित : यूरेनियम किडनी में जमा होता है और छोटे बच्चों की किडनी अभी विकसित हो रही होती है।
न्यूरोलॉजिकल विकास में बाधा : मस्तिष्क और नर्वस सिस्टम के विकास पर असर पड़ सकता है।
मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव : लंबे समय तक संपर्क में रहने से आईक्यू कम होने और मानसिक विकास में देरी की आशंका होती है।

विशेषज्ञों का क्या कहना है ?
अब सबसे जरूरी बात – विशेषज्ञ क्या कह रहे हैं? एम्स दिल्ली के डॉ. अशोक शर्मा, जो इस स्टडी के सह-लेखक हैं, ने स्पष्ट किया है कि हालांकि 70% शिशुओं में संभावित खतरा दिखता है, लेकिन वास्तविक स्वास्थ्य पर प्रभाव बहुत कम होने की उम्मीद है।
उन्होंने बताया, “मां के शरीर में जो यूरेनियम जाता है उसका ज्यादातर हिस्सा पेशाब के जरिए बाहर निकल जाता है, न कि दूध में जमा होता है। इसलिए दूध में यूरेनियम की सांद्रता काफी कम है।”
WHO ने पीने के पानी में यूरेनियम की सीमा 30 माइक्रोग्राम प्रति लीटर तय की है। कुछ देशों जैसे जर्मनी ने और भी सख्त मानक 10 माइक्रोग्राम प्रति लीटर रखा है। मां के दूध में पाई गई यूरेनियम की मात्रा (0-5.25 माइक्रोग्राम प्रति लीटर) इन सीमाओं से काफी नीचे है।
क्या मां को दूध पिलाना बंद कर देना चाहिए ?
यह सबसे बड़ा सवाल है जो हर मां के मन में आ रहा होगा। इसका जवाब एकदम साफ है – *बिल्कुल नहीं!*
सभी विशेषज्ञों ने एक स्वर में कहा है कि माताओं को स्तनपान बंद नहीं करना चाहिए। मां का दूध बच्चों के लिए सबसे बेहतरीन और पौष्टिक आहार है। इससे मिलने वाले फायदे यूरेनियम से होने वाले संभावित खतरों से कहीं ज्यादा हैं।
डॉ. शर्मा ने साफ शब्दों में कहा, “जब तक कोई खास मेडिकल कारण न हो, माताओं को स्तनपान जारी रखना चाहिए।”
नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी (NDMA) के वरिष्ठ वैज्ञानिक ने भी इस बात की पुष्टि की है कि पाए गए यूरेनियम के स्तर से कोई तत्काल सार्वजनिक स्वास्थ्य खतरा नहीं है।
बिहार में कितना गंभीर है यूरेनियम प्रदूषण ?
बिहार में यूरेनियम प्रदूषण की समस्या कोई नई बात नहीं है। पूरे भारत में 151 जिलों में यूरेनियम संदूषण की रिपोर्ट आई है जो 18 राज्यों में फैले हुए हैं। बिहार में 1.7% भूजल स्रोत यूरेनियम से प्रभावित हैं।
इसी शोध टीम ने पहले बिहार के 273 भूजल सैंपलों की जांच की थी और उनमें भी यूरेनियम संदूषण पाया गया था। यह दिखाता है कि समस्या की जड़ भूजल में है।
बिहार में लोग पीने के पानी और खेती दोनों के लिए भारी मात्रा में भूजल पर निर्भर हैं। जब यह पानी दूषित होता है तो यह सीधे खाद्य श्रृंखला में प्रवेश करता है।
अन्य राज्यों और देशों में क्या स्थिति है ?
यह सिर्फ बिहार की समस्या नहीं है। भारत में पहले ही आर्सेनिक, लेड और मर्करी भी मां के दूध में पाए जा चुके हैं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी कई देशों में यूरेनियम संदूषण की रिपोर्ट आई है – कनाडा, अमेरिका, फिनलैंड, स्वीडन, स्विट्जरलैंड, यूके, बांग्लादेश, चीन, कोरिया, मंगोलिया, पाकिस्तान और मेकांग डेल्टा क्षेत्र में।
हालांकि, दिलचस्प बात यह है कि इन देशों में भूजल में उच्च यूरेनियम पाए जाने के बावजूद, प्रभावित लोगों में साफ क्लिनिकल लक्षण लगातार नहीं देखे गए हैं।
अब क्या करना चाहिए? सरकार और लोगों की जिम्मेदारी : –
महावीर कैंसर इंस्टीट्यूट के मेडिकल सुपरिंटेंडेंट डॉ. एलबी सिंह ने बताया कि शोध टीम जल्द ही बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडे से मिलेगी और उन्हें उचित कदम उठाने का आग्रह करेगी।

सरकार को क्या करना चाहिए :
व्यापक जांच : बिहार में भूजल, मिट्टी, फसलों और मां के दूध की व्यापक जांच होनी चाहिए।
जियोलॉजिकल सर्वे : जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (GSI) पहले से ही संभावित भू-आधारित स्रोतों की जांच कर रही है।
पानी की व्यवस्था : प्रभावित इलाकों में साफ पीने के पानी की व्यवस्था करनी होगी।
बायोमॉनिटरिंग : कीटनाशकों, आर्सेनिक, लेड और मर्करी जैसे अन्य विषाक्त पदार्थों की भी लगातार जांच होनी चाहिए।
लोगों को क्या करना चाहिए :
शुद्ध पानी पिएं : विशेषकर गर्भवती और स्तनपान कराने वाली माताओं को मिनरल वाटर या फिल्टर किए हुए पानी का इस्तेमाल करना चाहिए।
ताजे फल और सब्जियां : खाने में ताजे फल और सब्जियों का उपयोग करें।
नियमित जांच : प्रभावित इलाकों में रहने वाले शिशुओं की नियमित स्वास्थ्य जांच कराएं।
जागरूकता : अपने आसपास के लोगों को इस बारे में जागरूक करें लेकिन घबराएं नहीं।
डॉ. सिंह की सलाह और सावधानियां : –
डॉ. एलबी सिंह ने बताया, “रक्त में यूरेनियम की उपस्थिति से मानसिक बीमारी, हड्डियों के विकास में अस्थिरता, किडनी की बीमारी हो सकती है और यह कैंसर तक भी पहुंच सकता है।”
उन्होंने स्तनपान कराने वाली माताओं को सलाह दी:
– शुद्ध मिनरल वाटर पिएं
– अपनी खान-पान की आदतों के प्रति सतर्क रहें
– ताजे फल और सब्जियां खाएं
– अपने बच्चों की नियमित स्वास्थ्य जांच कराएं
भविष्य में और शोध की जरूरत : –
यह स्टडी सिर्फ शुरुआत है। शोधकर्ता अब अन्य राज्यों में भी इसी तरह के अध्ययन करने की योजना बना रहे हैं। डॉ. शर्मा ने बताया कि वे अन्य हेवी मेटल्स के प्रभाव का भी अध्ययन कर रहे हैं।
भविष्य में कीटनाशकों और अन्य पर्यावरणीय प्रदूषकों पर भी शोध होगा। पहले के अध्ययन में आर्सेनिक, लेड और मर्करी की पहचान हो चुकी है।
चिंता नहीं, सतर्कता जरूरी : –
दोस्तों, यह खबर सुनकर घबराना स्वाभाविक है। लेकिन मैं आपसे कहूंगा कि अनावश्यक चिंता न करें। विशेषज्ञों ने साफ कर दिया है कि:
– यूरेनियम का स्तर सुरक्षित सीमा के भीतर है
– तुरंत कोई बड़ा खतरा नहीं है
– स्तनपान जारी रखना सबसे अच्छा विकल्प है
– मां का दूध शिशुओं के लिए सबसे पौष्टिक आहार बना रहेगा
हां, सतर्कता जरूरी है। सरकार को गंभीरता से इस मुद्दे पर काम करना चाहिए। भूजल प्रदूषण की समस्या को जड़ से खत्म करने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे।
ये भी पढ़े : – CBI का ठंडा रवैया और सेबी के डबल स्टैंडर्ड : सुप्रीम कोर्ट ने जमकर लगाई फटकार
समाज की जिम्मेदारी : –
यह सिर्फ सरकार का काम नहीं है। हम सबकी भी जिम्मेदारी है:
पानी बचाएं : भूजल का अत्यधिक दोहन न करें।
रासायनिक खाद कम करें : ऑर्गेनिक खेती को बढ़ावा दें।
प्रदूषण रोकें : औद्योगिक कचरे को सही तरीके से निस्तारित करें।
जागरूकता फैलाएं : अपने आसपास के लोगों को इस समस्या के बारे में बताएं।
सावधानी हां, दहशत नहीं : –
बिहार में मां के दूध में यूरेनियम मिलना चिंताजनक जरूर है लेकिन दहशत फैलाने वाली बात नहीं। यह एक चेतावनी है कि हमें अपने पर्यावरण, खासकर पानी की गुणवत्ता पर ध्यान देने की जरूरत है।
माताओं को स्तनपान जारी रखना चाहिए क्योंकि इससे मिलने वाले फायदे किसी भी संभावित खतरे से कहीं ज्यादा हैं। साथ ही, शुद्ध पानी पीने और स्वस्थ खान-पान पर ध्यान देना जरूरी है।
सरकार, वैज्ञानिक समुदाय और आम जनता – सभी को मिलकर इस समस्या का समाधान निकालना होगा। नियमित मॉनिटरिंग, बेहतर पानी की व्यवस्था, और पर्यावरण संरक्षण ही इस समस्या का दीर्घकालिक समाधान हैं।
याद रखें, जागरूकता ही सबसे बड़ा हथियार है। सही जानकारी और सही कदमों से हम अपने बच्चों का भविष्य सुरक्षित रख सकते हैं।