CJI सूर्या कांत ने NJAC को दोबारा लाने की याचिका पर विचार का दिया संकेत – कॉलेजियम सिस्टम पर बड़ा फैसला संभव

CJI ने NJAC को जिंदा करने की याचिका पर विचार का दिया संकेत – कॉलेजियम सिस्टम पर फिर उठे सवाल

संविधान दिवस पर एक बड़ा संकेत : – 

26 नवंबर 2024 को संविधान दिवस के मौके पर एक बड़ी खबर आई। देश के मुख्य न्यायाधीश सूर्या कांत ने संकेत दिया कि सुप्रीम कोर्ट उस याचिका पर विचार करेगा जो नेशनल ज्यूडिशियल अपॉइंटमेंट्स कमीशन (NJAC) को दोबारा लागू करने और कॉलेजियम सिस्टम को खत्म करने की मांग करती है। यह याचिका एडवोकेट मैथ्यूज जे. नेडुम्पारा ने दायर की है, और इसमें CJI, सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम, केंद्र सरकार और कई राजनीतिक पार्टियों को पक्षकार बनाया गया है।

यह मुद्दा पहली बार नहीं उठा है। पिछले कई सालों से न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति को लेकर बहस चल रही है। और अब जब CJI ने इस याचिका पर विचार करने का संकेत दिया है, तो इस बहस ने फिर से जोर पकड़ लिया है।

कॉलेजियम सिस्टम क्या है ?

पहले यह समझते हैं कि कॉलेजियम सिस्टम आखिर है क्या। सीधी भाषा में कहें तो यह एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जज खुद ही नए जजों की नियुक्ति करते हैं। सुप्रीम कोर्ट की कॉलेजियम में CJI और चार सबसे वरिष्ठ जज होते हैं। हाई कोर्ट की कॉलेजियम में CJ और दो वरिष्ठ जज होते हैं।

यह सिस्टम संविधान में लिखा नहीं था। यह तीन बड़े मामलों के फैसलों से बना – 1981 का एसपी गुप्ता केस, 1993 का सेकंड जजेस केस और 1998 का थर्ड जजेस केस। इन फैसलों के जरिए सुप्रीम कोर्ट ने धीरे-धीरे जजों की नियुक्ति का अधिकार अपने हाथों में ले लिया।

सरकार की भूमिका सिर्फ इतनी रह गई कि कॉलेजियम जो नाम भेजती है, राष्ट्रपति उन्हें नियुक्त कर दें। अगर सरकार कोई आपत्ति करे और कॉलेजियम दोबारा वही नाम भेज दे, तो सरकार को उन्हें नियुक्त करना ही पड़ता है।

कॉलेजियम सिस्टम की समस्याएं क्या हैं ?

अब सवाल यह है कि अगर जजों की नियुक्ति जज ही कर रहे हैं, तो इसमें दिक्कत क्या है? दिक्कतें बहुत सारी हैं, और खुद न्यायपालिका के लोग भी इन्हें मानते हैं।

पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस रूमा पाल ने कॉलेजियम सिस्टम को “देश के सबसे अच्छे तरीके से छिपाए गए रहस्यों में से एक” बताया था। उन्होंने इसकी गोपनीयता, जवाबदेही की कमी और अयोग्य जजों की नियुक्ति के खतरे की आलोचना की।

कॉलेजियम की बैठकें बंद दरवाजों के पीछे होती हैं। कोई नहीं जानता कि कब बैठक हुई, किसने क्या कहा, किस आधार पर फैसला लिया गया। कोई आधिकारिक कार्यवाही नहीं होती, कोई मिनट्स नहीं बनते। पारदर्शिता का तो सवाल ही नहीं उठता।

दूसरी बड़ी समस्या है भाई-भतीजावाद और पक्षपात की। जब कुछ जज ही तय करते हैं कि कौन जज बनेगा, तो अपने करीबी लोगों को आगे बढ़ाने का लालच हो सकता है। सबसे बड़ा उदाहरण है पूर्व CJI डी. वाई. चंद्रचूड़ का, जो खुद CJI वाई. वी. चंद्रचूड़ के बेटे हैं। कॉलेजियम ने ही उन्हें CJI बनाया।

तीसरी समस्या है विविधता की कमी। हायर ज्यूडिशियरी में महिलाओं की संख्या बहुत कम है। कई योग्य वकीलों को मौका नहीं मिलता क्योंकि उनकी पहुंच कॉलेजियम तक नहीं है।

NJAC क्या था और क्यों बनाया गया ?

कॉलेजियम की इन्हीं समस्याओं को दूर करने के लिए संसद ने 2014 में 99वां संविधान संशोधन पास किया और NJAC एक्ट बनाया। यह कानून लोकसभा और राज्यसभा दोनों में भारी बहुमत से पास हुआ। 16 राज्य विधानसभाओं ने भी इसे मंजूरी दी। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने 31 दिसंबर 2014 को इसे मंजूरी दे दी और 13 अप्रैल 2015 से यह लागू हो गया।

NJAC में छह सदस्य होने थे:
– CJI (चेयरपर्सन के रूप में)
– दो सबसे वरिष्ठ सुप्रीम कोर्ट जज
– केंद्रीय कानून मंत्री
– दो प्रतिष्ठित व्यक्ति जिन्हें PM, CJI और विपक्ष के नेता की कमेटी चुनती

इस सिस्टम में न्यायपालिका का बहुमत था, लेकिन सरकार और सिविल सोसाइटी का भी प्रतिनिधित्व था। कोई भी दो सदस्य किसी नियुक्ति को वीटो कर सकते थे। यह एक संतुलित व्यवस्था थी जिसमें चेक और बैलेंस था।

2015 में सुप्रीम कोर्ट ने NJAC को क्यों खत्म किया ?

लेकिन 16 अक्टूबर 2015 को सुप्रीम कोर्ट ने 4:1 के बहुमत से NJAC को असंवैधानिक करार देकर खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि कानून मंत्री और दो प्रतिष्ठित व्यक्तियों को शामिल करने से न्यायपालिका की स्वतंत्रता कमजोर होती है, जो संविधान की बुनियादी संरचना का हिस्सा है।

केवल एक जज जस्टिस जेएस चेलामेश्वर ने इस फैसले का विरोध किया। उन्होंने कहा कि NJAC कॉलेजियम के भीतर “अस्वस्थ समझौतों” और न्यायिक और कार्यकारी शाखाओं के बीच “अंदरूनी तालमेल” पर रोक लगा सकता था।

दिलचस्प बात यह है कि बाद में कई जजों ने माना कि 2015 का फैसला गलत था। जस्टिस रंजन गोगोई, जिन्होंने NJAC केस में बहुमत के साथ फैसला दिया था, बाद में सार्वजनिक रूप से पछताए। उन्होंने कहा कि अगले कुछ सालों में कॉलेजियम सिस्टम की खामियां और ज्यादा उजागर हुईं।

नई याचिका में क्या मांग की गई है ?

एडवोकेट मैथ्यूज जे. नेडुम्पारा की याचिका बहुत सख्त भाषा में है। उन्होंने कहा है कि 2015 का फैसला “एक बड़ी गलती” था क्योंकि इसका मतलब था “जनता की इच्छा को चार जजों की राय से बदलना।”

याचिका में कहा गया है कि कॉलेजियम सिस्टम “भाई-भतीजावाद और पक्षपात का पर्याय” बन गया है। Winston Churchill के शब्दों का इस्तेमाल करते हुए इसे “एक पहेली जो एक रहस्य में लिपटी हुई है, जो एक गुत्थी के अंदर है” बताया गया है।

याचिका में यह भी कहा गया है: “संसद जो जनता की इच्छा का प्रतिनिधित्व करती है, ने अपनी संविधान निर्माण की शक्ति का उपयोग करते हुए 99वां संविधान संशोधन और NJAC एक्ट बनाया था। लेकिन इस कोर्ट ने इसे रद्द कर दिया, जिससे संसद को एक निचली अदालत बना दिया।”

याचिका में 2015 के फैसले को शुरू से ही शून्य (void ab initio) घोषित करने की मांग की गई है।

CJI सूर्या कांत ने NJAC को दोबारा लाने की याचिका पर विचार का दिया संकेत - कॉलेजियम सिस्टम पर बड़ा फैसला संभव
CJI सूर्या कांत ने NJAC को दोबारा लाने की याचिका पर विचार का दिया संकेत – कॉलेजियम सिस्टम पर बड़ा फैसला संभव

राजनीतिक दलों का क्या कहना है ?

भारतीय जनता पार्टी (BJP) लंबे समय से NJAC की वकालत करती आ रही है। पार्टी का तर्क है कि कॉलेजियम सिस्टम में भाई-भतीजावाद और पक्षपात के मामले सामने आए हैं।

उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने भी दिसंबर 2022 में राज्यसभा में अपने पहले भाषण में कहा था कि NJAC को खत्म करने का फैसला संसद की शक्तियों पर न्यायपालिया का “अभूतपूर्व अतिक्रमण” था। उन्होंने कहा कि इससे शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत का उल्लंघन हुआ।

मार्च 2025 में धनखड़ ने विभिन्न राजनीतिक दलों के फ्लोर लीडर्स के साथ न्यायिक जवाबदेही के मुद्दे पर चर्चा की, लेकिन बैठक अनिर्णायक रही।

कानून मंत्री किरेन रिजिजू ने भी कॉलेजियम सिस्टम को “अपारदर्शी” बताया है और इसकी आलोचना की है।

वकीलों और न्यायविदों की राय बंटी हुई है : – 

प्रशांत भूषण और राम जेठमलानी जैसे वकीलों ने 2015 के फैसले का समर्थन किया था। उनका कहना था कि NJAC से न्यायपालिका की स्वतंत्रता खतरे में पड़ सकती थी।

लेकिन केके वेणुगोपाल, केटीएस तुलसी और जयप्रकाश नारायण जैसे न्यायविदों ने इस फैसले का विरोध किया था। उनका मानना था कि NJAC एक बेहतर सिस्टम था।

दिलचस्प बात यह है कि खुद न्यायपालिका के भीतर भी आवाजें उठी हैं। हाल ही में हिमाचल प्रदेश के दो वरिष्ठतम जिला न्यायाधीशों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की, जिसमें आरोप लगाया गया कि हाई कोर्ट कॉलेजियम ने जजों के चयन में उनकी योग्यता और वरिष्ठता को नजरअंदाज किया।

क्या है लोकतांत्रिक वैधता का सवाल ?

याचिका का एक मुख्य तर्क यह है कि NJAC को संसद में भारी बहुमत से पास किया गया था और 16 राज्य विधानसभाओं ने इसे मंजूरी दी थी। यह जनता की इच्छा को दर्शाता है।

दूसरी तरफ, कॉलेजियम सिस्टम किसी भी चुनाव प्रक्रिया से नहीं गुजरा। यह सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से बना है। तो सवाल यह है कि क्या कुछ जजों की राय संसद के फैसले से ज्यादा महत्वपूर्ण है?

समर्थकों का कहना है कि न्यायपालिया की स्वतंत्रता इतनी अहम है कि इसे किसी चुनावी बहुमत के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। लेकिन आलोचकों का कहना है कि चेक और बैलेंस के बिना कोई भी सिस्टम भ्रष्ट हो सकता है।

अन्य देशों में कैसे होती है नियुक्ति ?

अमेरिका में राष्ट्रपति सुप्रीम कोर्ट के जजों को नामित करता है और सीनेट उन्हें मंजूरी देती है। यह एक पारदर्शी प्रक्रिया है जिसमें सार्वजनिक सुनवाई होती है।

ब्रिटेन में एक स्वतंत्र कमीशन है जो जजों की नियुक्ति करता है। इसमें न्यायपालिका, कानूनी पेशेवर और सिविल सोसाइटी का प्रतिनिधित्व होता है।

भारत का कॉलेजियम सिस्टम इस मामले में अनोखा है कि यहां जजों की नियुक्ति में सरकार की कोई भूमिका नहीं है। दुनिया में शायद ही कोई दूसरा लोकतंत्र हो जहां ऐसा हो।

CJI सूर्या कांत का क्या रुख है ?

जब एडवोकेट नेडुम्पारा ने इस याचिका का मौखिक उल्लेख किया, तो CJI सूर्या कांत ने संकेत दिया कि कोर्ट इस पर विचार करेगा। हालांकि अभी तक सुनवाई की कोई तारीख तय नहीं हुई है।

CJI ने यह भी कहा कि कॉलेजियम सिस्टम एक कोर्ट के फैसले से बना था। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या एक रिट याचिका के जरिए कोर्ट के फैसले को चुनौती दी जा सकती है।

यह एक दिलचस्प कानूनी सवाल है। आमतौर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को केवल एक रिव्यू पिटीशन या क्यूरेटिव पिटीशन के जरिए चुनौती दी जा सकती है। लेकिन 2015 की रिव्यू याचिका को 2018 में खारिज कर दिया गया था।

क्या हो सकता है आगे ?

अगर सुप्रीम कोर्ट इस याचिका पर सुनवाई करता है, तो यह एक ऐतिहासिक मामला होगा। कोर्ट को अपने ही 2015 के फैसले पर दोबारा विचार करना होगा।

कुछ संभावनाएं हैं : –

पहली संभावना : कोर्ट याचिका को खारिज कर दे और कहे कि 2015 का फैसला सही था और न्यायपालिया की स्वतंत्रता सर्वोपरि है।

दूसरी संभावना : कोर्ट NJAC को वापस लाने के लिए राजी हो जाए, लेकिन कुछ सुरक्षा उपायों के साथ ताकि न्यायपालिया की स्वतंत्रता बरकरार रहे।

तीसरी संभावना : कोर्ट कॉलेजियम सिस्टम में सुधार का आदेश दे, जैसे कि पारदर्शिता बढ़ाना, सचिवालय बनाना, और चयन के स्पष्ट मानदंड तय करना।

आम आदमी के लिए यह क्यों मायने रखता है ?

बहुत से लोग सोच सकते हैं कि जजों की नियुक्ति का मामला तो कोर्ट और सरकार का आपसी मामला है, हमसे क्या लेना-देना। लेकिन असल में यह देश के हर नागरिक से जुड़ा है।

न्यायपालिका देश का एक स्तंभ है। जब आप किसी मुकदमे में जाते हैं, तो आप चाहते हैं कि आपको एक योग्य, ईमानदार और निष्पक्ष जज मिले। अगर जजों की नियुक्ति में भाई-भतीजावाद और पक्षपात है, तो न्याय कैसे मिलेगा?

दूसरा, लोकतंत्र में शक्तियों का संतुलन बहुत जरूरी है। अगर न्यायपालिया खुद ही तय करे कि कौन जज बनेगा, तो वह बहुत शक्तिशाली हो जाती है। चेक और बैलेंस का क्या होगा?

तीसरा, पारदर्शिता हर लोकतांत्रिक संस्था के लिए जरूरी है। जब जजों की नियुक्ति बंद दरवाजों के पीछे होती है और कोई नहीं जानता कि कैसे फैसले होते हैं, तो जनता में अविश्वास पैदा होता है।

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सुधार के सुझाव : – 

विशेषज्ञों ने कॉलेजियम सिस्टम में सुधार के कई सुझाव दिए हैं :

पारदर्शिता : कॉलेजियम की बैठकों के मिनट्स सार्वजनिक किए जाएं (गोपनीय जानकारी को छोड़कर)। यह बताया जाए कि किस आधार पर किसी को चुना गया या खारिज किया गया।

स्पष्ट मानदंड : चयन के लिए स्पष्ट और उद्देश्यपूर्ण मानदंड बनाए जाएं, जैसे योग्यता, वरिष्ठता, और विविधता।

सचिवालय : एक स्थायी सचिवालय बनाया जाए जो कॉलेजियम को सहायता दे और रिकॉर्ड रखे।

सरकार की भूमिका : सरकार को परामर्श की प्रक्रिया में शामिल किया जाए, लेकिन अंतिम फैसला न्यायपालिया का हो।

विविधता : महिलाओं, अल्पसंख्यकों और पिछड़े वर्गों के प्रतिनिधित्व को बढ़ाया जाए।

नेशनल ज्यूडिशियल कमीशन बिल 2022 : – 

दिलचस्प बात यह है कि 2022 में नेशनल ज्यूडिशियल कमीशन बिल पेश किया गया था, जो NJAC से थोड़ा अलग था। यह बिल जजों की नियुक्ति के साथ-साथ न्यायिक मानकों और जजों की जवाबदेही को भी नियंत्रित करता।

हालांकि यह बिल अभी तक पास नहीं हुआ है, लेकिन यह दिखाता है कि न्यायिक सुधार की मांग जारी है।

CJI सूर्या कांत का यह संकेत कि कोर्ट NJAC को दोबारा जिंदा करने की याचिका पर विचार करेगा, एक महत्वपूर्ण कदम है। यह एक ऐसी बहस को फिर से खोलता है जो 2015 में बंद हो गई थी।

सवाल सिर्फ कॉलेजियम बनाम NJAC का नहीं है। असली सवाल है – कैसे सुनिश्चित करें कि देश को सबसे योग्य, ईमानदार और निष्पक्ष जज मिलें? कैसे सुनिश्चित करें कि न्यायपालिया स्वतंत्र रहे, लेकिन साथ ही पारदर्शी और जवाबदेह भी हो?

आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले को कैसे संभालता है। क्या यह 2015 के अपने फैसले पर पुनर्विचार करेगा? क्या NJAC का कोई नया रूप सामने आएगा? या कॉलेजियम सिस्टम में कुछ सुधार किए जाएंगे?

जो भी हो, एक बात तय है – भारत की न्यायपालिया के भविष्य से जुड़ा यह एक अहम फैसला होगा, और इसका असर हर भारतीय नागरिक पर पड़ेगा।

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