ज़ोमैटो-स्विगी को छोड़ भारत के क्लाउड किचन क्यों बना रहे अपना खुद का ऐप ? जानिए पूरी कहानी
अगर आप सोच रहे हैं कि खाना ऑर्डर करने के लिए सिर्फ ज़ोमैटो और स्विगी ही हैं, तो ज़रा रुकिए! भारत में क्लाउड किचन का एक नया ट्रेंड शुरू हो चुका है और ये बड़ा दिलचस्प है। अब कई क्लाउड किचन कंपनियां इन डिलीवरी ऐप्स पर निर्भर रहने की बजाय अपने खुद के ऐप बना रही हैं और सीधे ग्राहकों तक पहुंच रही हैं। आखिर क्यों हो रहा है ये बड़ा बदलाव? चलिए इस पूरी कहानी को आसान भाषा में समझते हैं।
क्लाउड किचन बिज़नेस कितना बड़ा है ?
सबसे पहले जान लेते हैं कि भारत में क्लाउड किचन का बाज़ार कितना बड़ा हो चुका है। 2024 में ये बाज़ार 1.13 बिलियन डॉलर यानी करीब 9,700 करोड़ रुपये का था। अब सोचिए, ये आंकड़ा 2030 तक 2.84 बिलियन डॉलर यानी 24,500 करोड़ रुपये तक पहुंच जाएगा! हर साल औसतन 16.7% की रफ्तार से ये बाज़ार बढ़ रहा है।
कोविड महामारी ने इस बिज़नेस को रफ्तार दी। जब लॉकडाउन था और लोग घर से बाहर नहीं निकल पा रहे थे, तब ऑनलाइन खाना मंगाना ज़रूरत बन गया। रेस्टोरेंट्स के लिए क्लाउड किचन एक सस्ता और आसान विकल्प बन गया, क्योंकि इसमें न तो बैठने की जगह चाहिए, न वेटर्स की ज़रूरत, बस एक किचन काफी है।
ज़ोमैटो-स्विगी पर निर्भरता क्यों बन गई मुसीबत ?
यहां असली मुद्दा शुरू होता है। शुरुआत में तो क्लाउड किचन के लिए ज़ोमैटो और स्विगी जैसे डिलीवरी प्लेटफॉर्म वरदान की तरह थे। इन्होंने करोड़ों ग्राहक और आसान डिलीवरी सिस्टम मुहैया कराया। लेकिन धीरे-धीरे ये निर्भरता एक बोझ बन गई।
सबसे बड़ी समस्या है कमीशन। ज़ोमैटो और स्विगी हर ऑर्डर पर 20% से 30% तक कमीशन लेते हैं। अब ज़रा सोचिए – अगर आपका मुनाफा सिर्फ 10% है और आप 25% कमीशन दे रहे हैं, तो आप मुनाफे में नहीं, नुकसान में हैं! कई छोटे क्लाउड किचन तो बस इसी कमीशन के चक्कर में घाटे में चल रहे थे।
दूसरी परेशानी है कंट्रोल की कमी। जब आप इन प्लेटफॉर्म्स पर निर्भर हैं, तो आपके पास अपने ग्राहकों का डेटा नहीं है, आप अपनी मर्जी से प्राइस नहीं रख सकते, और हर छोटे-बड़े फैसले के लिए प्लेटफॉर्म के नियमों पर निर्भर रहना पड़ता है। ये बात कई कारोबारियों को खलने लगी।
डायरेक्ट टु कंज्यूमर (D2C) मॉडल क्या है ?
अब बात आती है नए तरीके की – डायरेक्ट टु कंज्यूमर या D2C मॉडल। इसमें कंपनियां अपना खुद का ऐप या वेबसाइट बनाती हैं और सीधे ग्राहकों को सर्विस देती हैं। बिचौलिया हटाओ, कमीशन बचाओ – बस यही है इस मॉडल का फंडा।
फरवरी 2025 में भारत की सबसे बड़ी क्लाउड किचन कंपनी रेबल फूड्स ने ‘QuickiES’ नाम से अपना ऐप लॉन्च किया। ये कोई सामान्य ऐप नहीं है – ये वादा करता है कि 15 मिनट में खाना पहुंचेगा, वरना फ्री! फिलहाल मुंबई में ये सर्विस शुरू हुई है, लेकिन जल्द ही ये दूसरे शहरों में भी आने वाली है।
रेबल फूड्स के पास फासोस, बेहरोज बिरयानी, ओवन स्टोरी पिज़्ज़ा, लंचबॉक्स, वेंडीज़ जैसे 45 से ज़्यादा ब्रांड्स हैं। अब वे QuickiES के ज़रिए इन सब ब्रांड्स का खाना सीधे ग्राहकों को पहुंचा रहे हैं, बिना किसी तीसरे प्लेटफॉर्म के।
क्यों काम कर रहा है ये मॉडल ?
आप सोच रहे होंगे कि आखिर ये नया तरीका काम क्यों कर रहा है? इसके कई कारण हैं।
पहला, टेक्नोलॉजी सस्ती हो गई है। आजकल एक ऐप बनवाना और उसे चलाना पहले के मुकाबले काफी आसान और सस्ता हो गया है। AI और डेटा साइंस की मदद से ये कंपनियां समझ पा रही हैं कि किस इलाके में कौन सा खाना ज़्यादा ऑर्डर होता है, कौन से समय पर डिमांड बढ़ती है।
दूसरा, ब्रांड पहचान। रेबल फूड्स जैसी कंपनियों के पास पहले से मजबूत ब्रांड्स हैं। फासोस या बेहरोज बिरयानी का नाम सुनते ही लोगों को पता है कि खाना कैसा होगा। इसलिए लोग उनके खुद के ऐप पर भी भरोसा कर लेते हैं।
तीसरा, मुनाफा बचता है। जब 20-30% का कमीशन नहीं देना पड़ता, तो या तो ये पैसा कंपनी की जेब में जाता है, या फिर ग्राहकों को सस्ते में खाना मिल सकता है। दोनों तरीके से फायदा है।
बाकी देश में क्या चल रहा है ?
सिर्फ रेबल फूड्स ही नहीं, बल्कि कई और कंपनियां भी इस दिशा में बढ़ रही हैं। दक्षिण भारत, जो क्लाउड किचन के मामले में सबसे आगे है (2024 में 35% से ज़्यादा मार्केट शेयर), वहां कई छोटी-बड़ी कंपनियां अपने खुद के ऐप और वेबसाइट बना रही हैं।
इंडिपेंडेंट यानी स्वतंत्र क्लाउड किचन, जो किसी बड़ी चेन का हिस्सा नहीं हैं, वे भी अब सोशल मीडिया, व्हाट्सएप, और अपनी वेबसाइट के ज़रिए सीधे ग्राहकों से जुड़ रहे हैं। 2024 में इंडिपेंडेंट क्लाउड किचन का मार्केट शेयर 60.8% था, जो दिखाता है कि छोटे खिलाड़ी भी इस खेल में मज़बूती से टिके हुए हैं।
चुनौतियां भी हैं कम नहीं : –
लेकिन ये रास्ता गुलाब के फूल नहीं है। अपना खुद का ऐप चलाना भी कोई आसान काम नहीं।
सबसे बड़ी चुनौती है ग्राहकों को अपने ऐप पर लाना। ज़ोमैटो और स्विगी पर करोड़ों यूज़र्स पहले से मौजूद हैं। जब कोई भूख लगती है, तो सबसे पहले इन्हीं ऐप्स को खोलता है। अब अपने ऐप को इतना अच्छा बनाना होगा कि लोग खुद-ब-खुद आएं।
दूसरी चुनौती है डिलीवरी नेटवर्क। ज़ोमैटो-स्विगी के पास हज़ारों डिलीवरी पार्टनर्स हैं जो हर गली-मोहल्ले में पहुंच सकते हैं। अगर आप खुद डिलीवरी करेंगे, तो उसके लिए भी इन्वेस्टमेंट चाहिए।
तीसरा, मार्केटिंग खर्च। लोगों को अपने ऐप के बारे में बताने के लिए विज्ञापन, ऑफर, डिस्काउंट – सब कुछ करना पड़ता है। ये भी कोई कम खर्च नहीं है।
भविष्य में क्या होगा ?
एक्सपर्ट्स का मानना है कि आने वाले समय में ये D2C मॉडल और मजबूत होगा। लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि ज़ोमैटो-स्विगी खत्म हो जाएंगे। असल में, दोनों चीज़ें साथ-साथ चलेंगी।
बड़ी कंपनियां जिनके पास मजबूत ब्रांड और पैसा है, वे अपने खुद के प्लेटफॉर्म बनाएंगी। छोटी कंपनियां शायद डिलीवरी ऐप्स पर ही निर्भर रहें, लेकिन साथ में व्हाट्सएप और सोशल मीडिया के ज़रिए भी ग्राहक बनाएंगी।
हाइपरलोकल किचन का ट्रेंड भी बढ़ेगा – यानी हर मोहल्ले में छोटे-छोटे किचन जो सिर्फ उस इलाके को सर्व करें। इससे डिलीवरी तेज़ और सस्ती हो जाएगी।
ग्राहकों को क्या फायदा ?
अब आप सोच रहे होंगे कि हमें इससे क्या फर्क पड़ता है? दरअसल, काफी फर्क पड़ता है!
जब कंपनियां कमीशन बचाती हैं, तो उनके पास दो विकल्प होते हैं – या तो ज़्यादा मुनाफा कमाएं, या ग्राहकों को सस्ता खाना दें। कम्पटीशन की वजह से ज़्यादातर कंपनियां दूसरा रास्ता चुनेंगी।
साथ ही, जब आप सीधे कंपनी के ऐप से ऑर्डर करते हैं, तो लॉयल्टी प्रोग्राम, विशेष ऑफर, और बेहतर कस्टमर सर्विस मिलती है। QuickiES जैसे ऐप 15 मिनट की डिलीवरी का वादा कर रहे हैं – ये स्पीड भी एक बड़ा फायदा है।
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अंतिम बात : –
भारत का क्लाउड किचन बाज़ार एक बड़े बदलाव के दौर से गुज़र रहा है। डिलीवरी ऐप्स पर पूरी तरह निर्भर रहने की जगह, अब कंपनियां अपने पैरों पर खड़ी होना चाह रही हैं। ये बदलाव रातों-रात नहीं होगा, लेकिन धीरे-धीरे ज़रूर होगा।
रेबल फूड्स जैसी बड़ी कंपनियों ने जो शुरुआत की है, वो छोटी कंपनियों के लिए भी रास्ता दिखा रही है। अगले 5-10 साल में हम देखेंगे कि खाना ऑर्डर करने के तरीके में बड़ा बदलाव आएगा।
एक बात तो तय है – जब तक भारत में भूखे पेट ऑफिस से घर लौटने वाले लोग हैं, तब तक क्लाउड किचन का धंधा चलता रहेगा। चाहे वो ज़ोमैटो से आए, चाहे QuickiES से, चाहे किसी और ऐप से – अंत में जो मायने रखता है वो है स्वादिष्ट खाना, सही समय पर, सही दाम में!
इस बदलाव को देखना दिलचस्प होगा। आप कौन सा तरीका पसंद करेंगे – पुराना ज़ोमैटो-स्विगी वाला या नया डायरेक्ट ऐप वाला? फैसला आपका है!
