अब आप सोचिए, आपके पास एक दुकान है। कुछ हिस्से अच्छे चल रहे हैं, कुछ में घाटा हो रहा है। आप सोचते हैं कि क्यों न उस हिस्से को बेच दिया जाए जिससे पैसा भी आए और बाकी दुकान को बेहतर चलाया जा सके। कुछ ऐसा ही सोच रही है भारत सरकार — और इसी सोच के तहत इस साल 47,000 करोड़ रुपये का डिसइनवेस्टमेंट टारगेट तय किया गया है, जिसे अब पार करने की तैयारी है।
अब आम आदमी की नजर से समझें तो डिसइनवेस्टमेंट का मतलब है कि सरकार अपने कुछ सरकारी कंपनियों में हिस्सेदारी बेचती है — ताकि उससे पैसा आए और उस पैसे से देश के दूसरे ज़रूरी काम किए जा सकें। ये कोई घाटे का सौदा नहीं है, बल्कि एक रणनीतिक फैसला है।
क्या है डिसइनवेस्टमेंट ?
सरकारी कंपनियों में सरकार की हिस्सेदारी होती है — जैसे कोल इंडिया, आईडीबीआई बैंक, एनएमडीसी स्टील, हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड वगैरह। जब सरकार इन कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी बेचती है, तो उसे डिसइनवेस्टमेंट कहते हैं। इससे सरकार को फंड मिलता है, जिसे वो इंफ्रास्ट्रक्चर, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे सेक्टर में लगा सकती है।

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इस साल का टारगेट और अब तक की प्रगति
2025-26 के लिए सरकार ने 47,000 करोड़ रुपये का डिसइनवेस्टमेंट टारगेट रखा था। DIPAM (Department of Investment and Public Asset Management) के सचिव अरुणीश चावला ने हाल ही में बताया कि जुलाई तक ही सरकार इस टारगेट का 33% हिस्सा हासिल कर चुकी है। यानी शुरुआत अच्छी रही है।
उन्होंने ये भी कहा कि जैसे ही बाजार स्थिर होंगे, सरकार और IPOs, OFS (Offer for Sale), और स्ट्रैटेजिक सेल्स लाएगी। IDBI बैंक का स्ट्रैटेजिक डिसइनवेस्टमेंट इसी वित्त वर्ष में पूरा होने की उम्मीद है।
सरकार बेच क्यों रही है ?
अब सवाल उठता है — सरकार को बेचने की जरूरत क्यों पड़ी? इसका जवाब है — फोकस और फंड। सरकार चाहती है कि वो उन सेक्टरों पर ध्यान दे जो देश की तरक्की के लिए ज़रूरी हैं। और जो कंपनियां प्राइवेट सेक्टर बेहतर चला सकता है, उन्हें निजी हाथों में सौंप दिया जाए।
इससे सरकार को दो फायदे होते हैं :
1. पैसा मिलता है, जिससे वो बजट में मदद कर सकती है।
2. कंपनियों की कार्यक्षमता बढ़ती है, क्योंकि प्राइवेट सेक्टर में प्रतिस्पर्धा ज्यादा होती है।
आम आदमी को क्या फर्क पड़ता है ?
अब बात करते हैं हम जैसे लोगों की — जो रोज़ाना काम पर जाते हैं, EMI भरते हैं, और सोचते हैं कि देश की अर्थव्यवस्था कैसे चल रही है। डिसइनवेस्टमेंट से सरकार को पैसा मिलता है, जिससे सड़कें बनती हैं, स्कूलों में सुधार होता है, और डिजिटल इंडिया जैसे प्रोजेक्ट्स को गति मिलती है।
इसके अलावा, जब सरकारी कंपनियां शेयर बाजार में आती हैं, तो आम निवेशक भी उनमें पैसा लगा सकते हैं। यानी अब सिर्फ बड़े लोग ही नहीं, बल्कि हम जैसे लोग भी इन कंपनियों में हिस्सेदार बन सकते हैं।
आगे क्या ?
सरकार ने साफ किया है कि डिसइनवेस्टमेंट का मतलब ये नहीं है कि वो पब्लिक सेक्टर से पूरी तरह हट रही है। बल्कि वो चाहती है कि पब्लिक सेक्टर मजबूत हो, लेकिन स्मार्ट तरीके से। डिविडेंड और एसेट मोनेटाइजेशन से भी सरकार को बड़ी कमाई हो रही है — इस साल 1.2 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा डिविडेंड का लक्ष्य रखा गया है।