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“जयपुर एसएमएस अस्पताल आग हादसा: आम लोगों की आंखों से देखी त्रासदी और दर्द”

"जयपुर एसएमएस अस्पताल आग हादसा: आम लोगों की आंखों से देखी त्रासदी और दर्द"

"जयपुर एसएमएस अस्पताल आग हादसा: आम लोगों की आंखों से देखी त्रासदी और दर्द"(image source - amar ujala)

जयपुर के SMS अस्पताल में रविवार रात जो आग लगी, उसने न सिर्फ सात लोगों की जिंदगी ले ली, बल्कि पूरे शहर को झकझोर दिया। बात करें तो ये सिर्फ कोई बड़ी खबर नहीं थी, ये घटना सबका दिल लगा कर रख गई। अस्पताल किसी के लिए उम्मीद की जगह होती है – लेकिन उस रात, कई परिवारों की उम्मीदें यहीं टूट गईं।

हादसे की रात : अफरातफरी और दर्दरात के करीब 11 बजे ट्रॉमा सेंटर के आईसीयू में अचानक धुआं उठना शुरू हुआ। वहां मौजूद मरीजों और उनके परिजनों को जल्दी ही समझ में आ गया कि कुछ बहुत गलत हो रहा है। जिनकी तबीयत थोड़ी ठीक थी, उन्होंने स्टाफ को आग लगने की जानकारी दी, पर अफसोस, जो सुना जाना चाहिए था, वो अनसुना रह गया। कई बार अलार्म बजाया, लेकिन जवाब नहीं मिला। हर कोई अपने मरीज को लेकर बाहर भागना चाहता था, कोई बेड समेत घसीटता निकाल रहा था, तो कोई गेट के बाहर रोता-बिलखता नजर आया।

पूरन सिंह, जिनका मरीज अंदर छूट गया, बताने लगे – “धुआं पूरे आईसीयू में फैल चुका था, पर सब भाग रहे थे, कोई देखने वाला नहीं था।”

ओम प्रकाश ने तो पहले ही डॉक्टर को आगाह किया था, लेकिन ध्यान देने से पहले ही हालात खराब हो चुके थे कुछ मरीज ऐसे भी थे जिन्हें बस छुट्टी मिलने वाली थी, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था “कोई बचाने वाला नहीं था।”वहां परिजनों ने एक बात और कही – “अस्पताल के स्टाफ ने जगह छोड़ दी, डॉक्टर भाग गए, वार्ड बॉय गायब, बचाने वाला कोई नहीं था।” एक बेटे ने कहा, “मां को बाहर लाने की कोशिश की, पर धुएं से घुटन इतनी थी कि कुछ कर नहीं पाए।”

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“जयपुर एसएमएस अस्पताल आग हादसा: आम लोगों की आंखों से देखी त्रासदी और दर्द”(image source-Hindustan)

आग लगने के ठीक बाद जिस पुलिस चौकी के लोग थे, उन्होने भी जितना बन सका, मदद की। कई पुलिसकर्मी तो खुद भी धुएं के चलते बीमार पड़े, पर हौसला नहीं टूटा .प्रशासन की लापरवाही और कमजोरियांपरिजनों के मुताबिक, आग लगने की खबर करीब 20 मिनट पहले ही प्रशासन तक पहुंच गई थी, लेकिन उस वक्त कोई फायर अलार्म बजा या वहीं आग बुझाने का सिलेंडर चला, ऐसा कुछ नजर नहीं आया. अस्पताल जैसा बड़ा संस्थान, जहां उम्मीद होती है कि हर आपात स्थिति का इंतजाम होना चाहिए, वहां इतनी गड़बड़ी देख कर हर कोई गुस्से में था।

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कुछ का आरोप है – “डॉक्टरों और स्टाफ को पहले ही चेतावनी दी गई थी, लेकिन किसी ने ध्यान नहीं दिया। मेडिकल स्टाफ सबसे पहले बाहर भागा”।

हादसे के बाद : जांच और सवालघटना के बाद मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा खुद अस्पताल पहुंचे और जांच के आदेश दे दिए। सभी मृतकों की पहचान उजागर की जा चुकी है – सीकर के पिंटू, भरतपुर की रुक्मणि देवी, आंधी के दिलीप, और अन्य। हादसे के बाद खुले आसमान के नीचे घायल मरीज तड़पते रहे, हर कोई बरसों तक इस रात को नहीं भूल पाएगा।

असल मुद्दा : सिस्टम की कमजोरी जयपुर जैसे बड़े शहर के सबसे मशहूर अस्पताल में अगर फायर अलार्म ना बजे, आग बुझाने की मशीनें ना हों, तो सवाल उठते हैं। कोई सोच भी नहीं सकता कि इलाज के लिए आए इंसान को ऐसे डर के साए में अस्पताल में रात काटनी पड़ेगी. इस घटना ने साफ कर दिया कि हमारी व्यवस्था सिर्फ कागज़ पर मजबूत है, असल में उसमें बहुत सारी कमजोरियां हैं।

परिवारों का दर्द और उम्मीद उन रात को खोए लोग सिर्फ आंकड़े नहीं हैं, वो हर परिवार की उम्मीद थे। मां, बेटे, बहन – जिसके लिए हर कोई आया था, उन्हें खो देना आसान नहीं होता। लोग उम्मीद करते हैं आगे ऐसा कभी ना हो, और जिम्मेदारों को सख्त सजा मिले — लेकिन ये तब होगा जब हमारी व्यवस्था भी भारत जैसी मजबूत बने।

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