भाई साहब, लद्दाख को लेकर जो कुछ पिछले दिनों हुआ है, वो सिर्फ खबर नहीं है—वो एक चेतावनी है। ऐसा नहीं कि वहां पहली बार विरोध हुआ हो, लेकिन इस बार जो हुआ, वो अलग था। इस बार सड़कों पर उतरे थे Gen Z—वो युवा जो स्मार्टफोन से दुनिया देखते हैं, लेकिन जब बात अपने हक की आती है, तो मैदान में भी उतरते हैं।
24 सितंबर 2025 को लेह की सड़कों पर हजारों युवा उतर आए। पहले तो शांतिपूर्ण अनशन चल रहा था, जिसे पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक लीड कर रहे थे। लेकिन जब दो बुजुर्ग प्रदर्शनकारी—एक 72 साल के पुरुष और एक 62 साल की महिला—बीमार होकर अस्पताल पहुंचे, तो जैसे युवाओं का सब्र टूट गया। फिर क्या था, नारे लगे, भीड़ बढ़ी, और देखते ही देखते बीजेपी ऑफिस और पुलिस की गाड़ी जल गई।
सरकार ने तुरंत धारा 163 (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) लगाकर पांच से ज़्यादा लोगों के इकट्ठा होने पर रोक लगा दी। लेकिन तब तक माहौल गरम हो चुका था। चार लोगों की मौत हुई, 80 से ज़्यादा घायल हुए, जिनमें 40 पुलिसकर्मी भी थे।

अब सवाल उठता है—आखिर ये विरोध क्यों हुआ ?
लद्दाख को 2019 में जम्मू-कश्मीर से अलग करके केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया। लेकिन इसके साथ कोई विधानसभा नहीं दी गई। यानी पूरा इलाका सीधे केंद्र सरकार के अधीन चला गया। शुरू में लोगों को लगा कि शायद इससे विकास होगा, लेकिन धीरे-धीरे उन्हें एहसास हुआ कि उनकी आवाज़ कहीं नहीं सुनी जा रही।
ये भी पढ़े : – क्या है H-1B वीज़ा और क्यों हो रहा है बवाल ?
लद्दाख के लोग चाहते हैं कि : –
- उन्हें राज्य का दर्जा मिले
- संविधान के छठे अनुसूची में शामिल किया जाए।
- ये अनुसूची आदिवासी इलाकों को विशेष अधिकार देती है—जैसे ज़मीन, जंगल और स्थानीय प्रशासन पर नियंत्रण। लद्दाख की जनसंख्या में 97% लोग अनुसूचित जनजाति के हैं। ऐसे में उनकी मांग जायज़ लगती है।
सोनम वांगचुक ने 15 दिन तक भूख हड़ताल की, लेकिन जब कोई ठोस जवाब नहीं मिला, तो युवाओं ने मोर्चा संभाल लिया। उन्होंने इसे “Gen Z क्रांति” कहा। सरकार ने आरोप लगाया कि वांगचुक ने नेपाल की Gen Z क्रांति और अरब स्प्रिंग जैसे उदाहरण देकर युवाओं को भड़काया। लेकिन वांगचुक ने साफ कहा कि उनका मकसद शांति था, और हिंसा से उन्हें दुख हुआ।

अब देखिए, ये विरोध सिर्फ राजनीति नहीं है। ये उस पीढ़ी की आवाज़ है जो सोशल मीडिया पर ट्रेंड चलाती है, लेकिन जब बात अपने भविष्य की आती है, तो सड़कों पर भी उतरती है। ये वो युवा हैं जो कहते हैं—“हमें सिर्फ इंटरनेट नहीं चाहिए, हमें पहचान चाहिए।”
सरकार ने बातचीत के लिए 6 अक्टूबर की तारीख तय की है, लेकिन सवाल ये है कि क्या तब तक माहौल शांत रहेगा ? और क्या युवाओं की मांगों को गंभीरता से लिया जाएगा ?
तो भाई, लद्दाख की वादियों में अब सिर्फ बर्फ नहीं है, वहां गुस्सा भी है। और जब Gen Z बोलती है, तो सिर्फ ट्वीट नहीं उड़ते—तख्त भी हिलते हैं।
1 thought on “लद्दाख की ठंडी वादियों में “Gen Z क्रांति” — अब सिर्फ पहाड़ नहीं, आवाज़ें भी गूंज रही हैं!”