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लद्दाख की वादियों में जब आग भड़की, सरकार ने उंगली सोनम वांगचुक की तरफ उठाई—अब कोर्ट की बारी है!

लद्दाख की वादियों में जब आग भड़की, सरकार ने उंगली सोनम वांगचुक की तरफ उठाई—अब कोर्ट की बारी है!

लद्दाख की वादियों में जब आग भड़की, सरकार ने उंगली सोनम वांगचुक की तरफ उठाई—अब कोर्ट की बारी है!(image source-ndtv)

 

लद्दाख को लेकर जो कुछ हुआ है, वो सिर्फ एक खबर नहीं है—वो एक बड़ी हलचल है। शांत पहाड़ों के बीच अचानक ऐसा तूफान उठा कि चार लोगों की जान चली गई, दर्जनों घायल हुए, और पूरे इलाके में कर्फ्यू लगाना पड़ा। और अब सरकार कह रही है कि इसके पीछे सोनम वांगचुक हैं। हां, वही पर्यावरण कार्यकर्ता जिनका नाम आपने ‘3 इडियट्स’ के असली फुंसुख वांगडू के तौर पर सुना होगा।

अब चलिए, बात को आम भाषा में समझते हैं।

10 सितंबर 2025 से लद्दाख में एक बड़ा आंदोलन चल रहा था। मांगें थीं—लद्दाख को राज्य का दर्जा मिले, संविधान की छठी अनुसूची में शामिल किया जाए, लेह और कारगिल के लिए अलग लोकसभा सीट हो, और नौकरियों में स्थानीय आरक्षण मिले। इन मांगों को लेकर सोनम वांगचुक समेत कई लोग भूख हड़ताल पर बैठे थे। 35 दिन तक शांतिपूर्ण अनशन चला।

लेकिन 24 सितंबर को हालात बिगड़ गए। दो बुजुर्ग अनशनकारियों की तबीयत बिगड़ी और उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ा। इसके बाद युवा शाखा ने विरोध प्रदर्शन और बंद का ऐलान कर दिया। फिर क्या था—बीजेपी ऑफिस में आग लग गई, काउंसिल सचिवालय पर पथराव हुआ, और हिंसा फैल गई। चार लोगों की मौत हुई, 80 से ज़्यादा घायल हुए, जिनमें 22 पुलिसकर्मी भी शामिल थे।

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अब सरकार का कहना है कि ये सब अचानक नहीं हुआ, बल्कि एक “सुनियोजित साजिश” थी। लद्दाख के उपराज्यपाल कविंदर गुप्ता ने साफ कहा कि माहौल को जानबूझकर बिगाड़ा गया। सरकारी सूत्रों ने दावा किया कि सोनम वांगचुक ने युवाओं को भड़काया, और नेपाल व अरब देशों की जन क्रांति का उदाहरण देकर उन्हें उकसाया।

सरकार ने ये भी कहा कि जब केंद्र सरकार ने 6 अक्टूबर को बातचीत की तारीख तय कर दी थी, तो फिर हिंसा क्यों हुई? क्या ये बातचीत को पटरी से उतारने की कोशिश थी? कुछ अफसरों ने तो ये भी सवाल उठाया कि क्या वांगचुक ने अपने मंच का इस्तेमाल निजी मुद्दों को छिपाने के लिए किया।

लद्दाख की वादियों में जब आग भड़की, सरकार ने उंगली सोनम वांगचुक की तरफ उठाई—अब कोर्ट की बारी है!(image source -NDTV)

अब मामला कोर्ट में है। सवाल ये है कि क्या वांगचुक वाकई दोषी हैं, या उन्हें राजनीतिक वजहों से निशाना बनाया जा रहा है? वांगचुक ने खुद कहा कि उन्हें हिंसा से दुख हुआ और उनका मकसद सिर्फ शांतिपूर्ण विरोध था। उन्होंने ये भी बताया कि दो अनशनकारियों की तबीयत बिगड़ने के बाद ही माहौल गरम हुआ।

लद्दाख की जनता अब दो हिस्सों में बंटी दिख रही है। एक तरफ वो लोग हैं जो वांगचुक को अपना नेता मानते हैं, दूसरी तरफ वो हैं जो मानते हैं कि आंदोलन को संभालने में चूक हुई। कोर्ट अब तय करेगा कि सच्चाई क्या है।

ये मामला सिर्फ लद्दाख का नहीं है—ये उस सवाल का जवाब ढूंढ रहा है कि क्या लोकतांत्रिक विरोध की आवाज़ को दबाया जा रहा है, या वाकई कोई साजिश थी? पहाड़ों में गूंजती ये आवाज़ अब दिल्ली की अदालतों तक पहुंच चुकी है। देखना ये है कि फैसला किसके हक में आता है—सरकार की सख्ती या जनता की उम्मीद?

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