जब EWS कोटे की सीट पर महंगे कॉलेज में पढ़ने लगे 148 छात्र – क्या यह धोखाधड़ी है ?
पहले समझें EWS कोटा क्या होता है : –
साल 2019 में देश में एक बड़ा बदलाव आया जब सरकार ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग यानी EWS (Economically Weaker Section) के लिए 10% आरक्षण शुरू किया। यह कोटा खासतौर पर उन छात्रों के लिए बनाया गया था जिनके परिवार की सालाना आय 8 लाख रुपये से कम है और उनके पास ज्यादा जमीन-जायदाद नहीं है।
मेडिकल कॉलेजों में NEET के जरिए दाखिला लेते समय यह कोटा काफी मददगार साबित होता है। सरकारी मेडिकल कॉलेजों में जहां फीस सिर्फ 10,000 से 50,000 रुपये सालाना होती है, वहीं प्राइवेट कॉलेजों में यह 10 लाख से 25 लाख रुपये तक पहुंच जाती है।uota-
अब देखें असली मुद्दा : –
NEET 2024 के काउंसलिंग डेटा की जांच में एक चौंकाने वाली बात सामने आई है। जिन 378 छात्रों ने EWS कोटे का फायदा उठाते हुए फॉर्म भरा था, उनमें से 148 छात्रों ने सीधे प्राइवेट डीम्ड यूनिवर्सिटीज में मैनेजमेंट कोटे से दाखिला ले लिया। और यह दाखिला कोई साधारण नहीं था – इन छात्रों ने 87.5 लाख से लेकर 5 करोड़ रुपये तक की भारी-भरकम फीस चुकाई!
अब सवाल यह उठता है कि जिस छात्र के परिवार की आय सिर्फ 8 लाख रुपये सालाना है, वह 5 साल के लिए करोड़ों रुपये की फीस कैसे दे सकता है? यह बात तो सामान्य समझ में भी नहीं आती।
33 छात्रों की NRI कोटे की कहानी और भी अजीब : –
इससे भी बड़ी बात यह है कि EWS कोटे में आवेदन करने वाले 33 छात्रों ने तो NRI कोटे से दाखिला ले लिया। इसमें उन्होंने अमेरिकी डॉलर या उसके बराबर भारतीय रुपये में औसतन 2.13 करोड़ रुपये चुकाए। एक छात्र की NEET रैंक तो 6,61,975 तक थी, फिर भी उसने सिर्फ पैसे के दम पर सीट हासिल कर ली।
यह कैसे हो सकता है कि एक आर्थिक रूप से कमजोर परिवार का बच्चा विदेशी मुद्रा में इतनी बड़ी रकम चुका दे? यह साफ तौर पर EWS नियमों का खुला उल्लंघन है।
फर्जी सर्टिफिकेट का खेल : –
विशेषज्ञों का मानना है कि यहां फर्जी EWS सर्टिफिकेट का बड़ा खेल चल रहा है। अमीर परिवार के छात्र किसी तरह से EWS का प्रमाणपत्र बनवा लेते हैं और फिर सरकारी कॉलेजों में आरक्षित सीटों पर दावा करते हैं। जब वहां नहीं मिलती, तो वे प्राइवेट कॉलेजों में करोड़ों रुपये खर्च करके दाखिला ले लेते हैं।
इसका सबसे बड़ा नुकसान उन असली गरीब छात्रों को होता है जो वाकई में मेधावी हैं और जिनके लिए यह कोटा बनाया गया था। उनकी सीटें इन धोखेबाजों की भेंट चढ़ जाती हैं।
राज्य स्तर पर भी बदलाव : –
महाराष्ट्र सरकार ने 2025-26 सत्र से प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में भी 10% EWS आरक्षण लागू कर दिया है। राज्य में 22 प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में कुल 3,120 जनरल कैटेगरी की सीटें हैं, जिसमें से अब करीब 300 सीटें EWS के लिए आरक्षित हो गई हैं।
हालांकि इससे जनरल कैटेगरी के छात्रों के लिए मुश्किलें बढ़ गई हैं क्योंकि कटऑफ स्कोर बढ़ने की संभावना है। साथ ही, प्राइवेट कॉलेजों को सीटें बढ़ाने की मंजूरी नहीं मिली है, इसलिए वे आर्थिक नुकसान से बचने के लिए फीस बढ़ा सकते हैं।
कितनी बड़ी है यह समस्या ?
भारत में 2025 में कुल 1,18,148 MBBS सीटें उपलब्ध हैं। इसमें से 59,782 सीटें सरकारी कॉलेजों में हैं और 58,366 प्राइवेट और डीम्ड यूनिवर्सिटीज में। ऑल इंडिया कोटा में 10% यानी करीब 550-600 सीटें EWS के लिए आरक्षित हैं।
लेकिन जब इन सीटों का गलत इस्तेमाल होता है, तो यह व्यवस्था पर सवालिया निशान खड़ा करता है। संसदीय समिति ने भी प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों की फीस में 50% की कटौती की सिफारिश की है, क्योंकि सालाना 15-25 लाख रुपये की फीस आम परिवारों के लिए बहुत भारी है।
क्या है इसका समाधान ?
सबसे पहले तो EWS सर्टिफिकेट की सख्त जांच होनी चाहिए। जिला अधिकारी, तहसीलदार जैसे अधिकारी ही यह प्रमाणपत्र जारी कर सकते हैं। लेकिन इसमें पारदर्शिता की सख्त जरूरत है।
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दूसरा, जो छात्र EWS कोटे का दावा करते हैं, उनकी काउंसलिंग के बाद आर्थिक स्थिति की दोबारा जांच होनी चाहिए। अगर कोई छात्र करोड़ों की फीस चुका पा रहा है, तो साफ है कि उसका EWS सर्टिफिकेट फर्जी है।
आम आदमी के लिए यह खबर क्यों मायने रखती है ?
यह सिर्फ एक न्यूज नहीं है, बल्कि हमारी शिक्षा व्यवस्था में भ्रष्टाचार की एक बड़ी तस्वीर है। जब अमीर लोग गरीबों के हक की सीटें हड़प लेते हैं, तो असल जरूरतमंद पीछे रह जाते हैं। यह देश के भविष्य के लिए खतरनाक है।
इसलिए जरूरी है कि सरकार इस मामले में सख्त कार्रवाई करे। फर्जी सर्टिफिकेट बनाने वालों और इस्तेमाल करने वालों दोनों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। तभी EWS कोटा अपने असली मकसद को पूरा कर पाएगा।
