सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार सार्वजनिक किया हाईकोर्ट जजों की सामाजिक पृष्ठभूमि का डेटा: CJI गवई के कोलेजियम का ऐतिहासिक कदम
पारदर्शिता की दिशा में बड़ा कदम : –
दोस्तों, 5 मई 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसा फैसला लिया जो न्यायपालिका में पारदर्शिता के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना की अगुवाई में सुप्रीम कोर्ट ने तीन महत्वपूर्ण दस्तावेज सार्वजनिक किए , जिनमें से सबसे चर्चित है – हाईकोर्ट के जजों की सामाजिक पृष्ठभूमि की पूरी जानकारी।
यह पहली बार हुआ है कि कोर्ट ने किसी जज की जाति, धर्म, लिंग और पारिवारिक पृष्ठभूमि जैसी जानकारियां सार्वजनिक तौर पर रखी हैं। हालांकि पहले भी कोलेजियम के प्रस्तावों में कभी-कभार यह जिक्र होता था कि कोई जज SC, ST या OBC समुदाय से है, लेकिन यह पहली बार है जब इस तरह की जानकारी एक व्यवस्थित तरीके से हर जज के लिए सार्वजनिक की गई है।
कितने जज, किस समुदाय से ?
9 नवंबर 2022 से 5 मई 2025 के बीच सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम ने देश भर के हाईकोर्ट्स में 221 जजों की नियुक्ति को मंजूरी दी । अब सवाल यह है कि इन 221 जजों में विभिन्न समुदायों का प्रतिनिधित्व कैसा रहा?
इन 221 नामों में से सिर्फ 8 जज अनुसूचित जाति से थे, 7 अनुसूचित जनजाति से, 32 अन्य पिछड़ा वर्ग से, और 31 अल्पसंख्यक समुदाय से थे। यानी कुल मिलाकर, 221 में से केवल 15 जज SC/ST समुदाय से थे। यह आंकड़ा साफ बता रहा है कि उच्च न्यायपालिका में सामाजिक विविधता की कितनी कमी है।
CJI चंद्रचूड़ और CJI खन्ना के कार्यकाल की तुलना : –
नवंबर 2022 से नवंबर 2024 तक CJI डी.वाई. चंद्रचूड़ के कार्यकाल में 303 उम्मीदवारों में से 170 नियुक्तियां मंजूर हुईं – जिनमें 7 SC, 5 ST, 21 OBC, 28 महिलाएं, 23 अल्पसंख्यक, और 12 ऐसे लोग जो सेवारत या सेवानिवृत्त जजों के रिश्तेदार थे।

नवंबर 2024 से मई 2025 तक CJI संजीव खन्ना के कार्यकाल में 103 उम्मीदवारों में से 51 नियुक्तियां मंजूर हुईं – जिनमें 11 OBC, 1 SC, 2 ST, 8 अल्पसंख्यक, 6 महिलाएं, और 2 जज रिश्तेदार थे।
अब CJI गवई के नेतृत्व में क्या उम्मीद ? : –
14 मई 2025 को जस्टिस भूषण रामकृष्ण गवई भारत के 52वें मुख्य न्यायाधीश बने। वे बौद्ध समुदाय से पहले CJI हैं और दूसरे दलित CJI हैं – पहले न्यायमूर्ति के.जी. बालाकृष्णन थे । गवई के पिता आर.एस. गवई एक राजनेता थे और उन्होंने 1956 में डॉ. बी.आर. अंबेडकर के साथ बौद्ध धर्म अपनाया था।
गवई के नेतृत्व में कोलेजियम के पास भारत की उच्च न्यायपालिका में सामाजिक और लैंगिक विविधता सुधारने का सुनहरा मौका है । खुद CJI गवई ने कई अहम मामलों में अनुसूचित जाति-जनजाति के प्रतिनिधित्व की बात की है।
“अंकल जज सिंड्रोम” की पोल खुली : –
इस डेटा में पहली बार यह भी बताया गया है कि कितने नए जज मौजूदा या सेवानिवृत्त जजों के रिश्तेदार हैं। यह जानकारी “अंकल जज सिंड्रोम” पर अक्सर होने वाली आलोचनाओं को संबोधित करने के लिए दी गई है।
221 जजों में से 14 ऐसे थे जिनके परिवार में पहले से कोई हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट जज था। उदाहरण के लिए, तेजस धीरेनभाई कारिया (दिल्ली हाईकोर्ट) जस्टिस बी.एन. कारिया (सेवानिवृत्त) के बेटे और गुजरात हाईकोर्ट के एक सेवारत जज के भाई हैं ।
महिलाओं का प्रतिनिधित्व : –
221 नियुक्तियों में कुल 34 महिलाएं थीं। यानी लगभग 15% प्रतिनिधित्व। वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट में सिर्फ एक महिला जज हैं – जस्टिस बी.वी. नागरत्ना। देश के 25 हाईकोर्ट्स में से सिर्फ एक में महिला मुख्य न्यायाधीश हैं – गुजरात में सुनीता अग्रवाल।
पुराने आंकड़ों से तुलना : –
2018 से 2023 के बीच नियुक्त 650 हाईकोर्ट जजों में से 492 जनरल कैटेगरी से थे (75.69%), जबकि सिर्फ 23 SC (3.54%), 10 ST (1.54%), 76 OBC (11.7%), और 36 अल्पसंख्यक (5.54%) थे। तुलना करें तो नए आंकड़े और भी चिंताजनक हैं।
सरकार और कोलेजियम के बीच खींचतान : –
नवंबर 2022 से अब तक कोलेजियम द्वारा अनुमोदित 221 नामों में से 29 अभी भी केंद्र सरकार की मंजूरी का इंतजार कर रहे हैं। CJI चंद्रचूड़ के कार्यकाल में अनुमोदित 170 नामों में से 17 अभी भी सरकार के पास लंबित हैं।
कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने स्पष्ट किया है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124, 217 और 224 में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति के लिए किसी जाति या वर्ग के लिए आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं है।
पारदर्शिता की मांग पुरानी है : –
द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2005) और राष्ट्रीय कानूनी मिशन (2013) दोनों ने न्यायिक नियुक्तियों में पारदर्शिता बढ़ाने की वकालत की थी। 2014 में जस्टिस आर.एम. लोढ़ा की अध्यक्षता में बनी समिति ने कोलेजियम के फैसलों को सार्वजनिक करने, नियुक्तियों के कारण प्रकाशित करने, और स्पष्ट योग्यता-आधारित मानदंड सुनिश्चित करने की ऐतिहासिक सिफारिशें कीं।
संपत्ति विवरण भी सार्वजनिक : –
1 अप्रैल को फुल कोर्ट की बैठक में यह तय हुआ था कि संपत्ति विवरण सार्वजनिक डोमेन में रखे जाएंगे। 5 मई को जारी प्रेस विज्ञप्ति में वादा किया गया कि बाकी जजों की संपत्ति का विवरण भी जल्द ही अपलोड किया जाएगा।

विविधता की कमी चिंताजनक : –
2018-2022 के दौरान हाईकोर्ट के 79% जजों की पृष्ठभूमि उच्च जाति की थी, जबकि हाशिए के समुदायों का प्रतिनिधित्व बेहद कम रहा । सुप्रीम कोर्ट में आज तक एक भी अनुसूचित जनजाति (ST) समुदाय से जज नहीं बने हैं।
वर्तमान में 5 जजों की कोलेजियम में 3 ब्राह्मण जज हैं। सुप्रीम कोर्ट में फिलहाल एक क्रिश्चियन जज (जस्टिस ए.जी. मसीह), एक मुस्लिम जज (जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह), और दो दलित जज (जस्टिस गवई और जस्टिस पी.बी. वराले) हैं।
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आगे की चुनौतियां
2024 में हाईकोर्ट्स में 331 न्यायिक पद खाली थे, जो कोलेजियम सिस्टम के तहत नियुक्तियों में देरी को उजागर करता है। सात हाईकोर्ट्स – सिक्किम, तेलंगाना, त्रिपुरा, मेघालय, ओडिशा, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख, तथा झारखंड – का सुप्रीम कोर्ट में कोई प्रतिनिधित्व नहीं है।
दोस्तों, यह डेटा सार्वजनिक करना पारदर्शिता की दिशा में एक सराहनीय कदम है। लेकिन आंकड़े जो तस्वीर दिखाते हैं, वह चिंताजनक है। देश की 16% आबादी SC है और लगभग 9% ST, लेकिन उच्च न्यायपालिया में उनका प्रतिनिधित्व नगण्य है।
महिलाओं की स्थिति भी बेहतर नहीं है।
अब जब CJI गवई जैसे व्यक्ति के हाथों में बागडोर है – जो खुद दलित समुदाय से हैं और अंबेडकर के विचारों से प्रेरित हैं – तो उम्मीद है कि वे इस असंतुलन को दूर करने की दिशा में ठोस कदम उठाएंगे।
पारदर्शिता लाना तो शुरुआत है, असली काम है – न्यायपालिका को सचमुच समावेशी और विविधतापूर्ण बनाना। क्योंकि जब तक अदालतों में समाज के सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व नहीं होगा, तब तक न्याय पर सबकी आस्था कैसे बनेगी ?