UGC, AICTE और NCTE होंगे खत्म – सिंगल रेगुलेटर को कैबिनेट की मंजूरी, क्या बदलेगा और क्या होंगे फायदे
देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव होने जा रहा है। केंद्रीय कैबिनेट ने शुक्रवार को ‘विकसित भारत शिक्षा अधिकरण बिल’ को मंजूरी दे दी है। इस फैसले के साथ ही अब तीन अलग-अलग शिक्षा नियामक संस्थाएं – UGC (यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन), AICTE (ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन) और NCTE (नेशनल काउंसिल फॉर टीचर एजुकेशन) – एक सिंगल रेगुलेटर में मिला दी जाएंगी। यह बिल अगले हफ्ते संसद के शीतकालीन सत्र में पेश किया जा सकता है।
अब तक क्या थी व्यवस्था ?
आज तक देश में तीन अलग-अलग संस्थाएं उच्च शिक्षा को नियंत्रित करती थीं। UGC सामान्य कॉलेजों और विश्वविद्यालयों की देखभाल करता था, AICTE इंजीनियरिंग और टेक्निकल कोर्सेज को मैनेज करता था, और NCTE टीचर ट्रेनिंग यानी B.Ed. जैसे कोर्सेज के लिए जिम्मेदार था।
लेकिन इस व्यवस्था में एक बड़ी परेशानी थी – ओवरलैपिंग। यानी कई बार एक ही काम के लिए कॉलेजों को दो-तीन संस्थाओं से अप्रूवल लेना पड़ता था। इससे काम में देरी होती थी, नियम टकराते थे और पेपरवर्क बढ़ता जा रहा था। देश भर की 50,000 से ज्यादा उच्च शिक्षा संस्थाओं और 1,170 विश्वविद्यालयों के लिए यह व्यवस्था काफी भारी पड़ रही थी।
नई व्यवस्था क्या है ?
नया बिल एक सिंगल रेगुलेटर बनाएगा जिसे पहले ‘हायर एजुकेशन कमीशन ऑफ इंडिया’ (HECI) कहा जा रहा था, लेकिन अब इसका नाम ‘विकसित भारत शिक्षा अधिकरण’ रखा गया है। यह नया संगठन सभी उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए एक ही छत के नीचे नियम बनाएगा, मानक तय करेगा और गुणवत्ता जांच करेगा।
हालांकि, मेडिकल और कानून की शिक्षा को इसमें शामिल नहीं किया जाएगा। मेडिकल कॉलेज NMC (नेशनल मेडिकल कमीशन) के अंडर रहेंगे और लॉ कॉलेज BCI (बार काउंसिल ऑफ इंडिया) के अंडर।
चार खंभों पर टिकेगा नया सिस्टम
नेशनल एजुकेशन पॉलिसी (NEP) 2020 में चार वर्टिकल्स का प्रस्ताव दिया गया था:
1. *नेशनल हायर एजुकेशन रेगुलेटरी काउंसिल (NHERC)* – नियम बनाने के लिए
2. *नेशनल एक्रेडिटेशन काउंसिल (NAC)* – गुणवत्ता जांच के लिए
3. *हायर एजुकेशन ग्रांट्स काउंसिल (HEGC)* – फंडिंग के लिए
4. *जनरल एजुकेशन काउंसिल (GEC)* – सीखने के नतीजे तय करने के लिए
हालांकि, अभी तक जो जानकारी आई है उसमें फंडिंग का काम अभी भी शिक्षा मंत्रालय के पास ही रहने की संभावना है, रेगुलेटर के पास नहीं।
क्या-क्या बदलेगा ?
1. एक दरवाजा, एक नियम
पहले किसी नए प्रोग्राम को शुरू करने या सीटें बढ़ाने के लिए कॉलेजों को अलग-अलग जगह दौड़ना पड़ता था। अब सिर्फ एक जगह से अप्रूवल मिलेगा। इससे समय और मेहनत दोनों की बचत होगी।
2. आसान क्रेडिट ट्रांसफर
छात्रों के लिए एक बड़ा फायदा यह होगा कि अगर वे एक कॉलेज से दूसरे कॉलेज में ट्रांसफर होना चाहें, तो उनके क्रेडिट्स आसानी से ट्रांसफर हो सकेंगे। अभी तो इसमें काफी दिक्कत आती है।
3. तेज़ फैसले
एक ही संगठन होने से फैसले जल्दी होंगे। नए कोर्स शुरू करने, रिसर्च सेंटर खोलने या किसी प्रोजेक्ट की मंजूरी में लगने वाला समय कम होगा।
4. समान मानक
अब सभी संस्थानों के लिए एक जैसे मानक होंगे। चाहे वह टेक्निकल कॉलेज हो या जनरल कॉलेज, सबके लिए गुणवत्ता के एक ही पैमाने होंगे।
क्या होंगे फायदे ?
छात्रों के लिए
– एडमिशन प्रोसेस आसान होगा
– बेहतर कोर्स चॉइस मिलेंगे
– कॉलेज बदलना आसान हो जाएगा
– डिग्री की विश्वसनीयता बढ़ेगी
कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के लिए
– कम लालफीताशाही
– जल्दी अप्रूवल मिलेंगे
– टकराते हुए नियमों से छुटकारा
– ज्यादा ऑटोनॉमी मिलने की संभावना
समग्र शिक्षा व्यवस्था के लिए
– पारदर्शिता बढ़ेगी
– जवाबदेही तय होगी
– रिसर्च और इनोवेशन को बढ़ावा मिलेगा
– अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय शिक्षा की साख बढ़ेगी
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क्या हैं चुनौतियां ?
हर बड़े बदलाव के साथ कुछ सवाल भी उठते हैं। संसदीय समिति ने चिंता जताई है कि कहीं ज्यादा शक्तियां केंद्र के पास न चली जाएं। देश के 90% से ज्यादा छात्र राज्य विश्वविद्यालयों में पढ़ते हैं, तो उनकी आवाज कैसे सुनी जाएगी?
UGC, AICTE और NCTE में काम करने वाले हजारों कर्मचारियों का क्या होगा? क्या उन्हें नई व्यवस्था में जगह मिलेगी या फिर से ट्रेनिंग दी जाएगी? ये सवाल अभी तक साफ नहीं हुए हैं।
एक और बात जो विशेषज्ञ कह रहे हैं वह यह है कि ग्रामीण इलाकों के छोटे कॉलेज जहां लैब, लाइब्रेरी और ट्रेंड फैकल्टी की कमी है, वे नए सख्त नियमों को कैसे फॉलो कर पाएंगे ?
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आगे क्या होगा ?
बिल अगले हफ्ते संसद में पेश किया जाएगा। अगर यह पास हो गया तो अगले कुछ महीनों में विस्तृत नियम बनाए जाएंगे। फिर धीरे-धीरे UGC, AICTE और NCTE के काम नए संगठन को ट्रांसफर किए जाएंगे। यह बदलाव एकदम से नहीं होगा, बल्कि चरणों में होगा ताकि पढ़ाई में कोई रुकावट न आए।
यह सुधार साल 2020 की नेशनल एजुकेशन पॉलिसी का हिस्सा था, जिसमें भारतीय शिक्षा व्यवस्था को आधुनिक और सक्षम बनाने का सपना देखा गया था। सरकार का दावा है कि यह कदम देश की 4.65 करोड़ से ज्यादा उच्च शिक्षा छात्रों के लिए फायदेमंद साबित होगा।
आखिर में कहें तो यह एक बड़ा प्रयोग है। अगर सही तरीके से लागू हुआ तो भारतीय उच्च शिक्षा में क्रांति आ सकती है। लेकिन अगर राज्यों, छात्रों और संस्थानों की चिंताओं को नजरअंदाज किया गया, तो नई परेशानियां खड़ी हो सकती हैं। वक्त बताएगा कि यह सिंगल रेगुलेटर भारतीय शिक्षा के लिए वरदान साबित होगा या नई पहेली।
