कभी-कभी लगता है कि अगर इंसान और प्रकृति एक-दूसरे का साथ दें, तो चमत्कार हो सकता है। गुजरात की विश्वामित्री नदी इसका जीता-जागता उदाहरण है। एक समय था जब ये नदी सूख चुकी थी, मगरमच्छ सड़कों पर घूमते थे, और लोग डर के मारे किनारे भी नहीं जाते थे। लेकिन अब हालात बदल रहे हैं—और इसके पीछे सरकार की पहल और प्रकृति की मेहरबानी दोनों हैं।
विश्वामित्री नदी वडोदरा शहर के बीचोंबीच बहती है। करीब 17 किलोमीटर लंबी ये नदी कभी शहर की पहचान हुआ करती थी। लेकिन वक्त के साथ इसमें गंदगी भरती गई, किनारों पर रिहायशी इलाकों का कब्ज़ा हो गया, और नदी का बहाव कमज़ोर पड़ता गया। हालत ये हो गई कि बरसात के मौसम में पानी तो आता था, लेकिन साथ में मगरमच्छ भी निकलकर सड़कों पर पहुंच जाते थे।

सबसे पहले बात करते हैं सरकार की। वडोदरा नगर निगम, वन विभाग और राज्य सरकार ने मिलकर एक योजना बनाई—नदी को फिर से जिंदा करने की। इसके लिए सबसे पहले नदी के किनारों की सफाई शुरू हुई। जो नाले सीधे नदी में गिरते थे, उन्हें बंद किया गया या ट्रीटमेंट प्लांट से जोड़ा गया। फिर मगरमच्छों की सुरक्षा के लिए वन विभाग ने निगरानी बढ़ाई और उन्हें सुरक्षित इलाकों में शिफ्ट किया।
ये भी पढ़े : – मुसी प्रोजेक्ट सिर्फ नदी की सफाई नहीं है, ये हैदराबाद को एक बेहतर शहर बनाने की कोशिश है।
सरकार ने सिर्फ कागज़ी काम नहीं किया, ज़मीन पर भी उतरी। स्थानीय लोगों को सफाई और संरक्षण के काम में लगाया गया, जिससे उन्हें रोज़गार मिला और नदी को नया जीवन। स्कूलों और कॉलेजों में जागरूकता अभियान चलाए गए ताकि युवा पीढ़ी समझे कि नदी सिर्फ पानी नहीं, जीवन है।
अब बात करते हैं प्रकृति की। 2024 और 2025 में अच्छी बारिश हुई, जिससे नदी का जलस्तर बढ़ा। भूजल भी ऊपर आया और आसपास की हरियाली लौटने लगी। पक्षी फिर से आने लगे, मगरमच्छ अपने पुराने घर में लौटे, और नदी की लहरें फिर से बहने लगीं।
प्रकृति ने मौका दिया, लेकिन अगर सरकार तैयार न होती, तो ये मौका भी बेकार चला जाता। यही तो असली बात है—जब इंसान और प्रकृति साथ चलें, तभी बदलाव आता है।
अब वडोदरा के लोग सुबह-शाम नदी किनारे टहलते हैं, बच्चे खेलते हैं, और लोग कहते हैं—“अब तो नदी फिर से जिंदा हो गई!” ये बदलाव सिर्फ पर्यावरण का नहीं है, ये सोच का है। पहले लोग कहते थे “सरकार कुछ नहीं करती”, अब कहते हैं “सरकार ने कर दिखाया।”
ये कहानी बताती है कि अगर हम चाहें, तो सूखी नदी भी बह सकती है, और सूनी ज़िंदगी भी खिल सकती है। बस ज़रूरत है साथ चलने की—सरकार, जनता और प्रकृति तीनों की। अब सोचिए, एक नदी जो लगभग मर चुकी थी, वो फिर से बहने लगी। और उसके साथ लोगों की उम्मीदें भी लौट आईं। ये सिर्फ एक नदी की कहानी नहीं है, ये उस सोच की कहानी है जो कहती है—अगर हम चाहें, तो प्रकृति को फिर से जिंदा कर सकते हैं।