जस्टिस गवई की मिसाल: नए CJI के लिए राष्ट्रपति भवन में छोड़ी आधिकारिक कार

जब पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने राष्ट्रपति भवन में छोड़ दी अपनी सरकारी गाड़ी – एक मिसाल जो दिल छू गई

सोमवार की सुबह राष्ट्रपति भवन में एक ऐसा दृश्य देखने को मिला जिसने हर किसी का दिल जीत लिया। जस्टिस बीआर गवई, जो अभी-अभी भारत के मुख्य न्यायाधीश के पद से रिटायर हुए थे, उन्होंने एक ऐसा काम किया जिसकी हर तरफ तारीफ हो रही है। आखिर क्या था वो खास पल? चलिए आपको विस्तार से बताते हैं।

शपथ ग्रहण समारोह में क्या हुआ ?

25 नवंबर 2025 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने जस्टिस सूर्यकांत को देश का 53वां मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया। राष्ट्रपति भवन में आयोजित इस शपथ ग्रहण समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह समेत कई गणमान्य लोग मौजूद थे।

इस समारोह में पूर्व सीजेआई बीआर गवई भी शामिल हुए थे। जस्टिस सूर्यकांत ने हिंदी में शपथ ली, जो अपने आप में एक खास बात थी। लेकिन असली चर्चा तो शपथ के बाद शुरू हुई।

राष्ट्रपति भवन में क्यों छोड़ी गाड़ी ?

शपथ ग्रहण समारोह खत्म होने के बाद जब सभी लोग अपने-अपने वाहनों से जाने लगे, तब जस्टिस गवई ने कुछ अलग किया। उन्होंने अपनी आधिकारिक मर्सिडीज-बेंज कार को वहीं राष्ट्रपति भवन में छोड़ दिया और खुद दूसरी गाड़ी से वापस लौट गए।

अब सवाल उठता है कि आखिर उन्होंने ऐसा क्यों किया? दरअसल, जस्टिस गवई चाहते थे कि नए मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत को सुप्रीम कोर्ट जाने के लिए तुरंत आधिकारिक गाड़ी की सुविधा मिल सके। वो नहीं चाहते थे कि किसी तरह की असुविधा हो या देरी हो।

क्यों है यह कदम इतना खास ?

देखिए, सरकारी पदों पर रहने वाले लोगों को कई सुविधाएं मिलती हैं। मुख्य न्यायाधीश को विशेष बुलेटप्रूफ वाहन, सुरक्षा गार्ड, और कई तरह की सुविधाएं दी जाती हैं। जब कोई इस पद से रिटायर होता है, तो आमतौर पर सारी औपचारिकताएं पूरी करने में वक्त लगता है।

लेकिन जस्टिस गवई ने बिना किसी दिखावे या औपचारिकता के तुरंत अपनी गाड़ी नए सीजेआई के लिए छोड़ दी। यह सादगी और जिम्मेदारी का एक बेहतरीन उदाहरण है। उन्होंने ये दिखाया कि पद की गरिमा और संस्था की प्रतिष्ठा व्यक्तिगत सुविधाओं से बढ़कर है।

नए मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत कौन हैं ?

जस्टिस सूर्यकांत को 30 अक्टूबर 2024 को अगला मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया था। वे लगभग 15 महीने तक इस पद पर रहेंगे और 9 फरवरी 2027 को 65 वर्ष की उम्र में रिटायर हो जाएंगे।

जस्टिस सूर्यकांत ने अपने करियर में कई महत्वपूर्ण मामलों को संभाला है और न्याय व्यवस्था में अपना योगदान दिया है। उनकी नियुक्ति देश की न्यायपालिका के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है।

लोगों की क्या है प्रतिक्रिया ?

सोशल मीडिया पर जस्टिस गवई के इस कदम की खूब सराहना हो रही है। लोग कह रहे हैं कि ऐसी मिसाल बहुत कम देखने को मिलती है। एक यूजर ने लिखा, “यही तो है असली नेतृत्व और संवेदनशीलता।”

कई लोगों ने इसे सरकारी पदों पर बैठे अन्य लोगों के लिए एक सबक बताया। आज के दौर में जब पद और सुविधाओं को लेकर काफी विवाद होते रहते हैं, जस्टिस गवई का यह व्यवहार सचमुच प्रेरणादायक है।

जस्टिस गवई की मिसाल: नए CJI के लिए राष्ट्रपति भवन में छोड़ी आधिकारिक कार
जस्टिस गवई की मिसाल: नए CJI के लिए राष्ट्रपति भवन में छोड़ी आधिकारिक कार

CJI को मिलने वाली सुविधाएं : –

भारत के मुख्य न्यायाधीश को कई विशेष सुविधाएं मिलती हैं। इनमें सरकारी बंगला, बुलेटप्रूफ वाहन, Z+ सुरक्षा, और चिकित्सा सुविधाएं शामिल हैं। मुख्य न्यायाधीश की सैलरी करीब 2.80 लाख रुपये प्रतिमाह होती है, साथ ही कई तरह के भत्ते भी मिलते हैं।

रिटायर होने के बाद भी पूर्व सीजेआई को कुछ सुविधाएं जीवनभर मिलती रहती हैं। लेकिन जस्टिस गवई ने दिखाया कि इन सुविधाओं से बढ़कर है संस्था की गरिमा और अपने उत्तराधिकारी के प्रति सम्मान।

क्यों है यह घटना याद रखने लायक ?

आज की तारीख में जब हर तरफ अपने फायदे की बात होती है, जस्टिस गवई का यह कदम एक ताजा हवा के झोंके जैसा है। उन्होंने साबित किया कि सच्ची महानता छोटे-छोटे कामों में होती है, बड़े-बड़े भाषणों में नहीं।

राष्ट्रपति भवन से निकलते वक्त उन्होंने जस्टिस सूर्यकांत को गले लगाया और अपनी शुभकामनाएं दीं। फिर बिना किसी हंगामे के अपनी निजी गाड़ी में बैठकर चले गए। यह सादगी और विनम्रता आज के समय में दुर्लभ है।

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अंतिम विचार : –

जस्टिस बीआर गवई का यह व्यवहार हमें सिखाता है कि असली सम्मान और महानता विनम्रता में है। जब आप किसी पद पर होते हैं तो सुविधाएं मिलना स्वाभाविक है, लेकिन उस पद की गरिमा बनाए रखना और अपने उत्तराधिकारी का सम्मान करना – यही असली बड़प्पन है।

यह घटना न्यायपालिका की मजबूती और भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता को दर्शाती है। जस्टिस गवई ने एक नई मिसाल कायम की है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनेगी।

उम्मीद है कि सरकारी पदों पर बैठे अन्य लोग भी इस मिसाल से सीख लेंगे और संस्थागत मूल्यों को व्यक्तिगत सुविधाओं से ऊपर रखेंगे। आखिरकार, यही है लोकतंत्र की असली ताकत

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