प्रधान न्यायाधीश (CJI) बी.आर. गवई ने हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने कहा—“न्याय कुछ लोगों का विशेषाधिकार नहीं, बल्कि हर नागरिक का अधिकार है।” यह बयान न केवल भारतीय न्याय व्यवस्था के मूल भाव को सामने लाता है, बल्कि वर्तमान में कानून और समाज के संबंध को भी उजागर करता है।
भूमिका: न्याय का लोकतांत्रिक अधिकार : –
भारत के सर्वोच्च न्यायालय में आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में, सीजेआई गवई ने जोर देकर कहा कि देश में न्याय केवल कुछ वर्गों का विशेषाधिकार नहीं हो सकता। न्याय का प्रकाश समाज के अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक पहुंचना चाहिए—यही संविधान की आत्मा है।
पीएम मोदी की उपस्थिति और संयुक्त संदेश : –
सीजेआई गवई के इस महत्वपूर्ण भाषण के समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी मंच पर मौजूद थे, जिस कारण यह संदेश और अधिक प्रभावशाली बन गया। गवई ने कहा—“न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका की साझा जिम्मेदारी है कि न्याय तक पहुंच हर भारतीय नागरिक को सुनिश्चित हो।” पीएम मोदी ने भी न्याय की सुगमता (Ease of Justice) को सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण का मूल आधार बताया।
आंकड़े और योजनाएँ : –
न्याय तक पहुंच : 2025 तक, भारतीय लीगल सर्विस अथॉरिटी (NALSA) के आँकड़ों के अनुसार, केवल 9% आबादी ही नि:शुल्क कानूनी सहायता का लाभ उठा पाई है, जबकि लाभ के योग्य लोगों का प्रतिशत कहीं अधिक ह।‘ई-कोर्ट्स’ और ‘ई-फाइलिंग’ जैसी डिजिटल पहल से केस फाइलिंग और ट्रैकिंग अधिक पारदर्शी हुई है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में अब भी जागरूकता और सुलभता बड़ी चुनौती है।

सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों द्वारा फैसले स्थानीय भाषाओं में देने की पहल से आम लोगों को अपनी भाषा में न्याय समझने में राहत मिली ह।
केस स्टडी : मानव-केंद्रित अनुभव : –
सीजेआई गवई ने मंच से पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर के चुराचांदपुर में एक महिला का उदाहरण दिया, जिसने कानूनी सहायता पाकर अपने परिवार का अधिकार सुरक्षित किया और बताया कि उसके लिए न्याय अब ‘कागज’ नहीं, जीवन की आशा बन गया। इस प्रकार की ह्यूमन स्टोरीज भारत में न्यायिक सेवा के मानवीय पक्ष को उजागर करती हैं।
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व्यवहारिक समाधान : –
- कानून की भाषा को सरल बनाना : पीएम मोदी ने सुझाव दिया कि कानून की भाषा ऐसी हो, जिसे आम नागरिक आसानी से समझ सके। फैसले स्थानीय भाषाओं में उपलब्ध कराने की दिशा में सुप्रीम कोर्ट प्रमुख भूमिका निभा रहा है।
- डिजिटल लीगल हेल्पडेस्क : प्रत्येक जिला और ग्रामीण क्षेत्र में डिजिटल लीगल सहायता केंद्र स्थापित किए जाएँ, ताकि तकनीकी सशक्तिकरण के साथ मानव हस्तक्षेप भी बना रहे।
- मानव-स्पर्श समाधान : कानूनी सहायता शिविर, मोबाइल कोर्ट, और समर्पित सामाजिक कार्यकर्ताओं की टीम — इन सबसे जरूरतमंदों तक व्यवहारिक न्याय पहुँच सकेगा।
- जागरूकता अभियान : रेडियो, सोशल मीडिया, स्थानीय भाषाओं में पॉडकास्ट द्वारा ग्रामीण और शहरी गरीबों के लिए जागरूकता प्रसार।
- व्यक्तिगत अनुभव : सिस्टम के भीतर सेकई वकील और समाजसेवी इस बात को लेकर सहमत हैं कि न्यायिक सहायता को केवल सरकारी तंत्र के भरोसे न छोड़कर सामुदायिक भागीदारी से मजबूत किया जा सकता है।
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मुंबई के एक युवा वकील ने साझा किया कि वे स्वयं बस्तियों में जाकर लोगों को उनके अधिकारों पर मुफ्त काउंसलिंग देते हैं, जिससे कानून का भय खत्म होता है और आत्मविश्वास बढ़ता है।
सीजेआई गवई और पीएम मोदी का साझा संदेश—“न्याय केवल कुछ का विशेषाधिकार नहीं, यह हर नागरिक का हक है”—भारत के लोकतांत्रिक यात्रा का केंद्र-बिंदु है। कानून को आसान, सुलभ और मानवीय बनाकर ही इस संकल्प को मजबूत किया जा सकता है। उदाहरण, आँकड़े और जमीनी अनुभव इस बात का प्रमाण हैं कि भारत, साझी भागीदारी से, न्याय को हर द्वार तक पहुँचाने की दिशा में प्रतिबद्ध है।