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क्लाउड सीडिंग तकनीक: खर्चा ज़्यादा, बारिश कम

क्लाउड सीडिंग तकनीक: खर्चा ज़्यादा, बारिश कम

क्लाउड सीडिंग तकनीक: खर्चा ज़्यादा, बारिश कम(image source - jagran)

कहानी की शुरुआत : –

सोचिए, देश में जब बारिश की बूंदें आसमान से गिरने की बजाय गुम हो रही हों, खेतों में सूखा पड़ जाए, तो वैज्ञानिक आखिर क्या करते? क्लाउड सीडिंग जैसी तकनीक का सहारा लेते हैं, जो बादलों में रसायन छिड़क कर बारिश पैदा करने की वैज्ञानिक कोशिश होती है। लेकिन क्या यह तरीका वाकई काम करता है? भारत में तीन बार इस तकनीक को आजमाया गया, एक करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च हो चुका है, पर बारिश नहीं हुई। आइए, समझते हैं इस पूरी कहानी को।

क्लाउड सीडिंग क्या है ? : –

क्लाउड सीडिंग का मतलब है, बादलों में ऐसे छोटे-छोटे रसायन यानी “सीडिंग एजेंट” जैसे सिल्वर आयोडाइड, सोडियम क्लोराइड डालना ताकि वे बारिश करे। यह प्रक्रिया विमान या ड्रोन की मदद से होती है, जिसमें बादलों के अंदर बूंदें जमाने वाली क्रिस्टल पैदा किए जाते हैं। ये क्रिस्टल पानी की बूंदों को बड़ा बनाकर धरती पर बारिश की शक्ल में गिराते हैं। लेकिन यह तभी संभव होता है जब बादल में पर्याप्त नमी हो और मौसम उपयुक्त हो। प्रकृति की मदद से यह प्रक्रिया तेज होती है, लेकिन इसके लिए सही बादलों का होना ज़रूरी है।

3 बार ट्रायल लेकिन बारिश नहीं : –

भारत में तीन बार क्लाउड सीडिंग का परीक्षण किया गया। विशेषज्ञों ने लाखों रुपये खर्च कर इस तकनीक को अपनाने और बारिश कराने की कोशिश की। लेकिन समस्या यह रही कि nature cooperation की कमी ने सब कुछ मुश्किल बना दिया। जिन बादलों में रसायन डाला गया, उनमें पर्याप्त नमी या सही तापमान नहीं था। इसलिए कोशिशों के बाद भी कोई खास बारिश नहीं हुई। यह एक टेक्निकल चुनौती है, क्योंकि क्लाउड सीडिंग मौसम के प्राकृतिक नियमों पर ही निर्भर रहता है, जो हमेशा पूरा साथ नहीं देता।

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खर्च की बात करें तो ? : –

एक वार्षिक क्लाउड सीडिंग प्रोजेक्ट पर भारत में 8 से 12 करोड़ रुपये तक खर्च हो सकता है। छोटे परीक्षणों में 12-40 लाख रुपये भी लगते हैं। सिल्वर आयोडाइड, पोटैशियम क्लोराइड जैसे रसायनों की खरीद, विमान या ड्रोन उड़ाने, तकनीकी लोगों को भुगतान, सभी मिलाकर यह पैसा जाता है। इसे आप एक बड़ी वैज्ञानिक कोशिश समझिए, जहां पैसा लगा कर बारिश ला पाने की कला सीखी जा रही है। फिर भी यह तकनीक महंगी और पूरी तरह सफल नहीं है।

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क्लाउड सीडिंग तकनीक: खर्चा ज़्यादा, बारिश कम(image source – hindi news,hindi samachar)

क्या यह तकनीक कारगर है ? : –

वैज्ञानिक मानते हैं कि क्लाउड सीडिंग सूखे इलाकों में मददगार हो सकती है, लेकिन हर बार काम करना मुश्किल है। सही बादल, सही मौसम न हो तो यह तकनीक बेअसर होती है। पर्यावरण पर भी इसके कुछ छोटे प्रभाव हो सकते हैं, लेकिन वैज्ञानिक इसे सुरक्षित मानते हैं। भारत जैसे विकासशील देश के लिए यह तकनीक एक बड़ा रास्ता खोल सकती है, मगर अभी इसे और समझने और सुधारने की जरूरत है।

आम आदमी की समझ से : –

सोचिए किसान भाई जो बारिश के लिए आसमान ताके हुए हैं। क्लाउड सीडिंग उनकी मदद तो कर सकती है, पर यह जादू की छड़ी नहीं। कई बार पैसा खर्च होने के बाद भी बारिश नहीं होती, यही हकीकत है। फिर भी यह कोशिश जारी है ताकि जब सही मौके आए तो बारिश की उम्मीद साथ हो।

आखिर में : –

क्लाउड सीडिंग एक वैज्ञानिक इनोवेशन है जो बार-बार ट्रायल हो रहा है। तीन बार कोशिश, करोड़ों खर्च और फिर भी मायूसी, यह दर्शाता है कि विज्ञान में सब कुछ आसान नहीं होता। पर उम्मीद भी है कि भविष्य में बेहतर तकनीक और ज्यादा समझ के साथ इस क्षेत्र में सफलता मिलेगी। तब तक यह आम लोगों और सरकार दोनों के लिए सीखने का दौर है

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