किसी के विरोध से नहीं रुकेगा कुर्मी आंदोलन: जानिए क्या है पूरा हाल

गृह मंत्रालय के बाद अब कुर्मी संगठनों की चुनौती: किसी के विरोध से नहीं रुकेगा आंदोलन।

आजकल राजनीति और समाज दोनों जगह एक खास मुद्दा जो उभर कर सामने आ रहा है, वह है कुर्मी समाज का आंदोलन। पूरा देश जान रहा है कि झारखंड, पश्चिम बंगाल और ओडिशा में कुर्मी समुदाय अपनी पहचान और अधिकारों के लिए सड़कों पर है। इन लोगों की सबसे बड़ी मांग है कि उन्हें आदिवासी (एसटी) का दर्जा दिया जाए। लेकिन इस मांग को लेकर आदिवासी संगठनों का विरोध भी सामने आया है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या विरोधी ताकतों के बीच ये आंदोलन रुकेगा? कुर्मी संगठनों का जवाब साफ़ है — नहीं!

हम सबकी अपनी कहानी : –

आप कल्पना कीजिए कि एक छोटा-सा किसान परिवार, जो सदियों से खेती करता रहा है, अपनी जमीन खो देता है। न सिर्फ जमीन, बल्कि पहचान भी। कुर्मी समाज के लोग ऐसे ही हालात से गुजर रहे हैं। प्रारंभ में वे पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) में आते थे, लेकिन अब वे चाहते हैं कि समय के साथ उनका दर्जा बदल कर आदिवासी का हो जाए, ताकि उन्हें आरक्षण और अन्य सरकारी लाभ मिल सकें।

इस मांग की वजह से झारखंड, पश्चिम बंगाल और ओडिशा में 2025 में बड़े पैमाने पर आंदोलन शुरू हो गए हैं। 20 सितंबर से कई इलाकों में रेल और सड़क जाम किए गए। जगह-जगह प्रदर्शन हुए। कई बार पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पें भी हुईं, जिससे मामला और गंभीर हो गया।

क्यों विरोध हो रहा है ?

दूसरी तरफ आदिवासी संगठनों ने कहा कि कुर्मी समुदाय को एसटी दर्जा देने की कोशिश उनकी पहचान और अधिकारों के लिए खतरा है। आदिवासी नेताओं का तर्क है कि एसटी की सूची में जगह सीमित है और अगर उसमें नए समुदाय जोड़े गए, तो उनका आरक्षण कम होगा। वे इसे “असंवैधानिक” और “घुसपैठ” कहते हैं। झारखंड के आदिवासी संगठन इसके खिलाफ चल रहे हैं और मोरचों पर आंदोलन कर रहे हैं।

किसी के विरोध से नहीं रुकेगा कुर्मी आंदोलन: जानिए क्या है पूरा हाल
किसी के विरोध से नहीं रुकेगा कुर्मी आंदोलन: जानिए क्या है पूरा हाल(image source – telegraph india)

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किन रास्तों पर चलेगा आंदोलन ?

कुर्मी संगठनों ने विरोध के बावजूद अपनी लड़ाई जारी रखने की कसम खाई है। वे कहते हैं कि कोई विरोध दिखाओ, आंदोलन उतना ही तेज चलेगा। 11 जनवरी 2026 को रांची के मोरहाबादी मैदान में एक महारैली होगी, जहां आंदोलन को और मजबूत करने के लिए आर्थिक नाकेबंदी की घोषणा की जाएगी।

इससे पहले नवंबर और दिसंबर में हजारीबाग, चंदनकियारी, जमशेदपुर, धनबाद, और बोकारो जैसे शहरों में कुर्मी अधिकार रैलियां आयोजित होंगी। ये रैलियां आंदोलन को जीवित रखने और लोगों को जागरूक करने की बड़ी कवायद हैं।

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युवाओं की भूमिका और भावी रास्ता : –

कुर्मी युवा खासतौर पर इस आंदोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रहे हैं। बेरोजगारी और जमीन के नुकसान ने उनमें आंदोलन की लपट को और जलाया है। युवा नेता कहते हैं कि यह सिर्फ आरक्षण की लड़ाई नहीं, बल्कि उनके अस्तित्व की लड़ाई है।

इस बीच यह आंदोलन न केवल सामाजिक मुद्दा बना है, बल्कि राजनीतिक भी बन चुका है। विभिन्न पार्टियां इस मुद्दे पर अपनी-अपनी राय रख रही हैं। विपक्ष को इसका मौका मिलता दिख रहा है, जबकि सत्ता पक्ष इसे जोड़ने या टालने की रणनीति बना रहा है।

आम आदमी की समझ : –

अगर इसे सीधी भाषा में देखें तो समस्या इतनी है: कुर्मी समाज अपने लिए वे सुविधाएं और अधिकार चाहता है जो कई आदिवासी समुदायों को मिलते हैं। दूसरी ओर आदिवासी समुदाय अपनी सांस्कृतिक पहचान बचाने के लिए उस मांग का कड़ा विरोध कर रहा है। दोनों पक्ष की अपनी-अपनी परेशानियां और उम्मीदें हैं, जो आसानी से हल नहीं हो पा रही हैं।

कुर्मी संगठनों ने साफ कर दिया है कि उनका आंदोलन किसी भी विरोध से नहीं रुकेगा। वे अपनी लड़ाई लंबी और जोरदार बनाएंगे। इसके पीछे उनकी मांगें गहरी हैं, जिनका हल राजनीति, सामाजिक समझदारी और संवैधानिक तरीके से ही संभव है।

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