“हम गुस्से में हैं” – सुप्रीम कोर्ट ने NGO पर लगाया 1 लाख जुर्माना, अल्पसंख्यक स्कूलों को RTE से बाहर रखने वाले फैसले को चुनौती देने पर
शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में कुछ ऐसा हुआ जो शायद ही कभी देखने को मिलता है। जज इतने नाराज हुए कि उन्होंने साफ-साफ कहा, “हम गुस्से में हैं।” मामला था एक NGO का जिसने कोर्ट के अपने ही पुराने फैसले को चुनौती दे दी। यह फैसला 2014 का था जिसमें अल्पसंख्यक स्कूलों को शिक्षा के अधिकार कानून (RTE Act) से बाहर रखा गया था। जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने NGO पर 1 लाख रुपये का जुर्माना लगाते हुए कहा कि ऐसी याचिकाएं देश की न्यायपालिका को नीचा दिखाने की कोशिश हैं।
क्या था मामला ?
“यूनाइटेड वॉइस फॉर एजुकेशन फोरम” नाम की एक NGO ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। इस याचिका में मांग की गई थी कि कोर्ट अपने 2014 के फैसले को पलट दे और सभी अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों – चाहे वे सरकारी मदद लेते हों या न लेते हों – को RTE एक्ट के दायरे में लाया जाए।
NGO का कहना था कि अल्पसंख्यक स्कूलों को छूट देना असंवैधानिक है क्योंकि इससे उन्हें पूरी छूट मिल जाती है। खासतौर पर RTE एक्ट की धारा 12(1)(c) से, जिसमें कहा गया है कि हर निजी स्कूल को अपनी 25 फीसदी सीटें गरीब और कमजोर वर्ग के बच्चों के लिए रिजर्व करनी होंगी।
याचिका में यह भी मांग की गई थी कि एक एक्सपर्ट कमिटी बनाई जाए जो संविधान के आर्टिकल 30 (अल्पसंख्यकों को अपनी संस्थाएं चलाने का अधिकार) और आर्टिकल 21A (6 से 14 साल के बच्चों को मुफ्त शिक्षा का अधिकार) के बीच संतुलन बिठाने के लिए एक फ्रेमवर्क तैयार करे।
कोर्ट का गुस्सा क्यों ?
जस्टिस नागरत्ना ने सुनवाई के दौरान कहा, “आप सुप्रीम कोर्ट के साथ ऐसा नहीं कर सकते। हम गुस्से में हैं। यह पूरे देश की न्यायपालिका के सिस्टम के खिलाफ है अगर आप ऐसे केस फाइल करना शुरू करेंगे। आपको अपने केस की गंभीरता का अंदाजा नहीं है। हम खुद को रोक रहे हैं, वरना 1 लाख से ज्यादा जुर्माना लगा सकते थे।”
कोर्ट ने वकीलों को भी फटकार लगाते हुए कहा, “यहां क्या हो रहा है? वकील ऐसी सलाह दे रहे हैं? हमें वकीलों को भी दंडित करना पड़ेगा। ऐसे केस फाइल करके इस देश की न्यायपालिका को नीचे मत गिराइए।”

बेंच ने यह भी कहा, “आप कानून जानने वाले प्रोफेशनल हैं, और आप आर्टिकल 32 के तहत रिट पिटीशन दायर करके इस कोर्ट के फैसले को चुनौती दे रहे हैं? यह प्रक्रिया का सबसे बुरा दुरुपयोग है। हम खुद को रोक रहे हैं, वरना अवमानना का नोटिस जारी कर सकते थे। आप इस देश की न्यायपालिका को ध्वस्त करना चाहते हैं।”
असली मुद्दा क्या था ?
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट के अपने फैसले को चुनौती देने का एक सही तरीका होता है। अगर कोई कोर्ट के फैसले से खुश नहीं है तो उसे रिव्यू पिटीशन या क्यूरेटिव पिटीशन दायर करनी चाहिए। लेकिन NGO ने सीधे आर्टिकल 32 के तहत एक नई रिट याचिका दायर कर दी, जो सुप्रीम कोर्ट की अपनी ही बेंच के फैसले को चुनौती देती थी।
यह ऐसा है जैसे आप किसी मैच के रेफरी के फैसले से नाखुश होकर सीधे उसी मैच के दौरान मैदान में जाकर रेफरी को बदलने की मांग करने लगें। कानूनी प्रक्रिया में ऐसा नहीं चलता।
कोर्ट ने कहा, “कोई भी रिट पिटीशन सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ मान्य नहीं है। यह कानून की प्रक्रिया और अदालत का सबसे घोर दुरुपयोग है। हम इस याचिका को खारिज करते हैं और 1 लाख रुपये का खर्च लगाते हैं जो सुप्रीम कोर्ट लीगल सर्विसेज कमिटी को दिया जाएगा। यह बाकी सभी ऐसे याचिकाकर्ताओं के लिए एक उदाहरण होना चाहिए।”
2014 का फैसला क्या था ?
2014 में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने प्रमति एजुकेशनल एंड कल्चरल ट्रस्ट बनाम भारत संघ के मामले में फैसला दिया था कि RTE एक्ट अल्पसंख्यक स्कूलों पर लागू नहीं होगा – चाहे वे सरकारी मदद लेते हों या नहीं।
कोर्ट ने कहा था कि संविधान का आर्टिकल 30(1) धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को अपनी शिक्षण संस्थाएं स्थापित करने और चलाने का अधिकार देता है। अगर उन पर RTE के सभी नियम लागू होंगे तो उनकी अल्पसंख्यक पहचान खत्म हो जाएगी।
खासतौर पर 25 फीसदी सीट रिजर्वेशन का मुद्दा था। कोर्ट का मानना था कि अगर अल्पसंख्यक स्कूलों को अपनी एक चौथाई सीटें गैर-अल्पसंख्यक बच्चों को देनी होंगी, तो धीरे-धीरे उनका अल्पसंख्यक चरित्र ही खत्म हो जाएगा।
क्या सिर्फ एक तरफा कहानी है ?
नहीं। दिलचस्प बात यह है कि सितंबर 2024 में खुद सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच ने इस 2014 के फैसले पर सवाल उठाए थे। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने कहा था कि हो सकता है 2014 के फैसले ने “अनजाने में” सार्वभौमिक प्राथमिक शिक्षा की नींव को कमजोर कर दिया हो।
उस बेंच ने कहा था, “अल्पसंख्यक संस्थानों को RTE एक्ट से बाहर रखने से साझा स्कूली शिक्षा का विजन टूट रहा है और आर्टिकल 21A में कल्पना की गई समावेशिता और सार्वभौमिकता कमजोर हो रही है।”
बेंच ने यह भी कहा था कि बच्चों को जाति, वर्ग, धर्म और समुदाय से ऊपर उठकर एकजुट करने की बजाय, यह व्यवस्था “विभाजन” को मजबूत कर रही है और साझा सीखने की जगहों की “परिवर्तनकारी क्षमता को कमजोर” कर रही है।

उस बेंच ने मामले को बड़ी बेंच के पास भेज दिया था ताकि इस फैसले पर दोबारा विचार किया जा सके। यानी खुद सुप्रीम कोर्ट में भी इस मुद्दे पर अलग-अलग राय है।
तीन महीने का फासला
दिलचस्प बात यह है कि NGO ने यह याचिका उस वक्त दायर की जब सुप्रीम कोर्ट की दूसरी बेंच ने सितंबर में ही 2014 के फैसले पर सवाल उठाए थे। यानी महज तीन महीने बाद।
शायद NGO को लगा होगा कि जब खुद कोर्ट के जज उस फैसले पर सवाल उठा रहे हैं तो अब याचिका दायर करने का सही वक्त है। लेकिन उन्होंने यह नहीं समझा कि कोर्ट अपने भीतर मामले की समीक्षा कर रहा है, इसका मतलब यह नहीं कि कोई भी बाहर से आकर सीधे नई याचिका दायर कर दे।
RTE एक्ट क्या है ?
2009 में बना शिक्षा का अधिकार कानून (Right to Education Act) एक क्रांतिकारी कानून है। इसमें कहा गया है कि 6 से 14 साल तक के हर बच्चे को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा मिलनी चाहिए।
इस कानून की धारा 12(1)(c) में यह प्रावधान है कि हर निजी स्कूल को अपनी कुल सीटों का 25 फीसदी गरीब और कमजोर वर्ग के बच्चों के लिए रिजर्व करना होगा। इन बच्चों की फीस सरकार देगी।
यह कानून सिर्फ सीटों के बारे में नहीं है। इसमें स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं, ट्रेंड टीचर्स, पढ़ाई का तरीका, परीक्षा व्यवस्था – सबके बारे में नियम हैं। लेकिन 2014 के फैसले के बाद अल्पसंख्यक स्कूलों पर ये नियम लागू नहीं होते।
दोनों तरफ के तर्क
अल्पसंख्यक स्कूलों की तरफ से तर्क:
– संविधान का आर्टिकल 30 अल्पसंख्यकों को अपनी संस्थाएं चलाने का मौलिक अधिकार देता है
– अगर 25 फीसदी सीटें गैर-अल्पसंख्यक बच्चों को देनी होंगी तो धीरे-धीरे स्कूल का अल्पसंख्यक चरित्र खत्म हो जाएगा
– ये स्कूल अपने समुदाय की भाषा, संस्कृति और धार्मिक मूल्यों को बचाने के लिए बनाए गए हैं
– सरकार जो पैसा देती है वह पूरी फीस का भुगतान नहीं करता, इससे स्कूलों पर आर्थिक बोझ बढ़ता है
RTE लागू करने की मांग करने वालों के तर्क :
– हर बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का समान अधिकार है, चाहे वह किसी भी धर्म या समुदाय का हो
– अल्पसंख्यक स्कूल जनरल कैटेगरी के बच्चों से पूरी फीस लेते हैं लेकिन गरीब बच्चों को नहीं लेते
– कई स्कूल सिर्फ RTE से बचने के लिए “अल्पसंख्यक” का दर्जा ले रहे हैं, जबकि उनमें अल्पसंख्यक समुदाय के बच्चे बहुत कम हैं
– शिक्षा में बराबरी और समावेशिता होनी चाहिए, अलगाव नहीं
आंकड़े क्या कहते हैं ?
नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स के एक अध्ययन से पता चला है कि अल्पसंख्यक स्कूलों में सिर्फ 8.76 फीसदी छात्र वंचित वर्ग से आते हैं, जबकि 62.5 फीसदी गैर-अल्पसंख्यक समुदाय के हैं।
यानी कई अल्पसंख्यक स्कूल असल में अपने समुदाय की सेवा नहीं कर रहे, बल्कि सभी समुदायों के बच्चों से पूरी फीस लेकर मोटा मुनाफा कमा रहे हैं। लेकिन साथ ही RTE से छूट का फायदा भी उठा रहे हैं।
सितंबर में सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने यह भी कहा था कि अल्पसंख्यक दर्जा लेने के लिए न्यूनतम अल्पसंख्यक छात्रों की संख्या के बारे में कोई स्पष्ट नियम नहीं है। इससे कई संस्थाओं ने “अल्पसंख्यक” का दर्जा ले लिया है बिना वास्तव में अल्पसंख्यक समुदाय की सेवा किए।
क्या होना चाहिए ?
यह एक जटिल सवाल है और दोनों तरफ के तर्क अपनी जगह सही हैं। एक तरफ अल्पसंख्यक समुदायों को अपनी पहचान बचाने का संवैधानिक अधिकार है। दूसरी तरफ हर बच्चे को अच्छी शिक्षा पाने का भी संवैधानिक अधिकार है।

शायद बीच का रास्ता यह हो सकता है :
– अल्पसंख्यक स्कूलों को पूरे RTE से छूट नहीं, बल्कि कुछ खास प्रावधानों से छूट दी जाए
– 25 फीसदी सीटों में से कुछ सीटें खुद अल्पसंख्यक समुदाय के गरीब बच्चों के लिए रिजर्व की जाएं
– अल्पसंख्यक दर्जा लेने के लिए स्पष्ट मानदंड बनाए जाएं – जैसे कम से कम 50 फीसदी छात्र उसी अल्पसंख्यक समुदाय के होने चाहिए
– टीचर की योग्यता, बुनियादी ढांचे जैसे मानकों को सभी स्कूलों पर लागू किया जाए
आगे क्या होगा ?
फिलहाल यह मामला बड़ी बेंच के पास है। सितंबर में जब दो जजों की बेंच ने 2014 के फैसले पर सवाल उठाए थे, तब उन्होंने मामले को चीफ जस्टिस के पास भेज दिया था ताकि एक बड़ी बेंच इस पर फिर से विचार करे।
इस बीच कोर्ट ने आदेश दिया है कि अल्पसंख्यक स्कूलों को छोड़कर बाकी सभी स्कूलों को RTE का पालन करना होगा जब तक बड़ी बेंच अंतिम फैसला नहीं कर देती।
टीचर एलिजिबिलिटी टेस्ट (TET) के मामले में कोर्ट ने थोड़ी राहत दी है। उन शिक्षकों को जिन्हें रिटायरमेंट में पांच साल से कम बचे हैं, उन्हें TET पास किए बिना भी काम करने की इजाजत दी गई है।
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NGO की गलती कहां थी ?
NGO की मंशा शायद अच्छी रही होगी – वे चाहते थे कि सभी बच्चों को समान अवसर मिले। लेकिन उनकी गलती यह थी कि उन्होंने कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले को चुनौती देने का सीधा तरीका यह नहीं है कि आप नई रिट याचिका दायर कर दें। पहले रिव्यू पिटीशन दायर करनी होती है, अगर वह खारिज हो जाए तो क्यूरेटिव पिटीशन का विकल्प है।
इसके अलावा, जब खुद सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच मामले की समीक्षा के लिए बड़ी बेंच के पास भेज चुकी है, तो नई याचिका दायर करना और भी गलत था। यह ऐसा लगा जैसे NGO कोर्ट की प्रक्रिया को दरकिनार करके शॉर्टकट लेना चाहती थी।
सबक क्या मिला ?
यह मामला हमें कई सबक देता है :
*न्यायपालिका की मर्यादा*: कोर्ट के फैसलों से असहमत हो सकते हैं, लेकिन उन्हें चुनौती देने का सही तरीका अपनाना जरूरी है। शॉर्टकट लेने की कोशिश पूरे सिस्टम को नुकसान पहुंचाती है।
*वकीलों की जिम्मेदारी*: जस्टिस नागरत्ना ने सही कहा कि वकीलों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। गलत सलाह देकर या गलत याचिकाएं दायर करवाकर वे न सिर्फ अपने मुवक्किल का नुकसान करते हैं, बल्कि पूरी न्याय व्यवस्था की साख को भी खतरे में डालते हैं।
*धैर्य रखना जरूरी*: जब कोर्ट पहले से ही किसी मुद्दे पर विचार कर रहा है, तो उस प्रक्रिया का सम्मान करना चाहिए। जल्दबाजी में गलत कदम उठाने से फायदे से ज्यादा नुकसान होता है।
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अल्पसंख्यक स्कूलों और RTE का मुद्दा आसान नहीं है। यह सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक मुद्दा भी है। एक तरफ अल्पसंख्यकों के अधिकार हैं, तो दूसरी तरफ बच्चों की शिक्षा का अधिकार।
NGO पर 1 लाख रुपये का जुर्माना शायद उनके इरादों को देखते हुए सख्त लगे, लेकिन कोर्ट ने यह संदेश देना जरूरी समझा कि कानूनी प्रक्रिया की अनदेखी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। यह जुर्माना दूसरों के लिए एक चेतावनी है कि गलत तरीके से याचिका दायर करने के परिणाम होंगे।
असली सवाल यह है कि क्या हम ऐसा संतुलन बना सकते हैं जहां अल्पसंख्यक समुदायों की पहचान भी बची रहे और साथ ही हर बच्चे को अच्छी शिक्षा भी मिले? जब बड़ी बेंच इस मामले पर फैसला करेगी, तभी हमें जवाब मिलेगा।
फिलहाल तो एक बात साफ है – न्याय व्यवस्था अपनी प्रक्रियाओं को लेकर बेहद संजीदा है। और यह सही भी है। क्योंकि अगर कोर्ट के अपने नियम-कायदे नहीं रहेंगे, तो अराजकता फैल जाएगी। आज एक NGO ने गलत तरीके से याचिका दायर की, कल कोई और करेगा। इससे पहले कि यह एक चलन बन जाए, कोर्ट ने सख्त संदेश दे दिया है।
अब देखना यह है कि बड़ी बेंच क्या फैसला करती है। क्या 2014 का फैसला बरकरार रहेगा या उसमें कुछ बदलाव होंगे? जो भी हो, वह फैसला भारतीय शिक्षा व्यवस्था के लिए ऐतिहासिक होगा।